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वो घर का बँटवारा — कविता साव

संस्मरण

वो घर… जिसमें मेरी बचपन की हँसी गूँजती थी,
जहाँ दादी की आवाज़ से भोर होती और माँ की लोरी से रात ढलती,
वही घर, एक दिन अदालत के काग़ज़ों में “जायदाद” बन गया।
पहले पहल जब “बँटवारे” की बात उठी, तो लगा किसी ने आँगन के तुलसी चौरे में दरार डाल दी हो।
भाई अब “साझेदार” कहे जाने लगे, और कमरे “हिस्से” बन गए।
दीवारें जो कभी त्यौहारों में रंग से भर उठती थीं, अब निशानों से चिन्हित थीं—
“यह हिस्सा बड़ा भाई का”, “यह मंझले का”, “यह छोटे का”।
माँ तब भी कहती रही घर बांटने से रिश्ते भी बंट जाते हैं।
पर अफसोस, घर के साथ मन भी बाँट गए।
वो बैठक जहाँ सब साथ बैठकर चाय पीते थे,
अब खाली पड़ी थी— बस एक पुरानी चारपाई और कुछ अधूरे संवाद।
दादी की तस्वीर, जो दीवार पर टंगी थी, जैसे सवाल करती हो—
बँटवारा हुआ, सबको हिस्से मिले
किसी को छत मिली, किसी को ज़मीन,
पर मुझे सिर्फ़ यादें मिलीं—
वो छत की शामें, वो पिता की हँसी, वो बरामदे का पेड़…
जो अब न मेरे हिस्से में है, न किसी और के,
बस हवा में झूलता है — जैसे पुराना अपनापन।

आज जब कभी उस पुराने घर के सामने से गुज़रता हूँ,
तो कदम रुक जाते हैं।
दरवाज़ा वही है, पर आँगन अब अनजाना लगता है।
दीवारें देखती हूँ तो लगता है,काश सब पहले जैसा हो जाता और फिर तू ,मैं से हम हो जाते।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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