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बाल दिवस की यादें — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

बाल दिवस…
नाम लेते ही जैसे मन एकदम से वापस उन्हीं सुनहरे दिनों में लौट जाता है, जब उम्र छोटी थी, सपने बड़े थे और दिल में बस उत्साह की धड़कनें ही धड़कती थीं। 14 नवंबर का दिन मेरे लिए किसी त्योहार से कम नहीं होता था। स्कूल का हर कोना जैसे उस दिन मुस्कान पहन लेता था,दीवारें रंगीन, कक्षाएँ सजधजकर किसी उत्सव-भवन सी लगतीं, और शिक्षक भी उस दिन हम बच्चों को डाँटने के बजाय हँसते-मुस्कुराते नजर आते।

सुबह-सुबह नहाकर, सबसे साफ-धुली यूनिफॉर्म पहन, बालों में तेल लगाकर स्कूल जाने का जो उत्साह होता था,वो आज भी याद आते ही चेहरे पर मुस्कान ले आता है। गेट पर पहुंचते ही ढोलक-ताशे तो नहीं होते थे, लेकिन बच्चों की खिलखिलाहट ही किसी बैंड से कम नहीं लगती थी। उस दिन असेंबली में चाचा नेहरू के बारे में विशेष भाषण होता, उनकी बच्चों से प्रेम की कहानियाँ सुनाई जातीं। छोटे-छोटे चेहरे बड़ी-बड़ी आँखों से उन्हें सुनते,जैसे किसी राजकथा का हिस्सा हों।

फिर शुरू होता था असली उत्सव नाटक, गीत, नृत्य, कविताएँ, रंगोली, प्रतियोगिताएँ…
हर बच्चा उस दिन कुछ ना कुछ बनना चाहता,कोई डॉक्टर, कोई परिंदा, कोई तितली, तो कोई सैनिक।
मैं भी कभी-कभी अपनी मर्जी से और कभी शिक्षक के मन से कोई किरदार चुन लेती, पर मंच पर खड़े होने का रोमांच,वो हमेशा एक-सा ही रहता।

जिस दिन में मिलने वाली मिठाइयाँ ,(विशेषकर मोती छूट के लड्डू)भी जैसे किसी खजाने से कम नहीं होती थीं। टॉफ़ी का छोटा सा पैकेट शुरू में बड़ा मामूली लगता था, पर उसमें भी हम अपने दोस्तों के साथ हम सब ऐसे बांटते थे जैसे जीवन का सबसे अनमोल उपहार हो। बाल दिवस का जश्न खत्म होता था, पर उसकी खुशियाँ अगले कई दिनों तक मन में चमकती रहती थीं।

आज बड़े होकर जब दुनिया के तजुर्बे मन पर धूल सी बिखेर देते हैं, तो मन अक्सर उन दिनों की ओर लौट जाता है। सोचती हूँ,कितना सरल था हमारा बचपन! न कोई चिंता, न कोई बोझ, सिर्फ पढ़ना, खेलना, सपने देखना और हर छोटी चीज़ में जश्न ढूंढ लेना।

बाल दिवस की मेरी यादें मेरे लिए सिर्फ यादें नहीं,बल्कि वो आईना हैं जिसमें आज भी मुझे मेरा सबसे सच्चा, सबसे निर्मल, और सबसे खूबसूरत रूप दिखाई देता है।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

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