जिम्मेदारी बोझ बन के रह गई — नीलम सोनी फॉर्म ब्यावर

आज कल के माता-पिता अपने बच्चों के अप्रत्यक्ष रूप से सबसे बड़े शत्रु बन रहें हैं ।
क्योंकि वे बच्चों की क्षमता जाने बिना उन्हें जबरदस्ती अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने पर विवश कर रहे हैं ।
जबकि उनके बच्चों को अंग्रेजी माहौल मिल ही नहीं पाता ।
जैसे बहुत से स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम तो है जबकि उनके स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले शिक्षकों का पूर्णतया अभाव है
और घर परिवार एवं आस पास का वातावरण भी अंग्रेजी माहौल से विहीन है ,
तो ऐसे में बच्चे बिचारे क्या कर सकते हैं ?
बच्चे अपनी मनोदशा अपने माता-पिता और शिक्षकों से व्यक्त ही नहीं करते ।
जो बच्चे अपनी मनोदशा को व्यक्त करने की कोशिश भी करते हैं, तो उनके माता-पिता और शिक्षक गण उनकी मनोदशा को समझने के बजाय जमकर क्लास ले लेते हैं ।
जिससे बच्चे भयभीत होकर चिड़चिड़े एवं एकांकीपन के शिकार हो जाते है। धीरे धीरे बच्चे बड़े होते जाते । जो माता पिता को उचित लगता उसी सांचे में ढल जाते। फिर बच्चों का इंटरेस्ट होता किसी और सीखने में। मम्मी पापा को कुछ और पसंद होता।ना पसंद होते हुए भी। उन्हें वो अब कुछ करना पड़ता जो मम्मी पापा ने कह दिया। इन सभी के बीच में खो जाती है तो उनकी मासूमियत । एक छोटी सी कहानी में सुनने जा रही हु। अगर अपने माता पिता कभी बुरा नहीं चाहते बच्चों का । लेकिन कभी कभी उन्हें समझ लेते तो पूरी जिंदगी एक बोझ बन के नहीं कटनी पड़ती। एक प्रिया नाम की लड़की थी। शुरू से हर चीज में होशियार हर काम को लेके रुचि दिखती थी। पर माता पिता तुम लड़की हो तुम्हे शोभा नहीं देता है। हर जगह उसके रोक टॉक ।पढ़ना चाहती लेकिन पुराने परम्परों पुरानी सोच ज्यादा पढ़ लिख के क्या करना। अगले घर जाकर चुल्लl चौका करना।ऐसे करके उस काम में मना कर देते थे। उसे पढ़ने नही दिया।उसकी जल्दी शादी कर दी। 3 बच्चे भी हो गए।शादी के कुछ समय बाद ही किस्मत ने ऐसी करवट ली। उसका पति को दारू की लत लग गई। गलत कामों की आदत पड़ गई।सब काम धंधा छोड़ के घर मे पड़ा रहता था हमेशा और झगड़ा करता रहता था। ससुराल वाले कुछ कहते नहीं थे। उल्टा बेटे को भड़कते रहते थे।और मरने भेजते थे। उधर पीहर वाले कहते थे।किस्मत के आगे क्या कर सकते। या तो पति को छोड़ के पीहर बैठ जा।कोई कहता ससुराल वालों पति पे केस कर दे
हर इंसान ने अपनी अपनी राय दे दी। इधर उधर काम करके बच्चों का घर खर्च चलती है।जिंदगी मे परेशानियों पे परेशानी आने लगी।कोई साथ नहीं।जिंदगी अब समझ आने लग गई। काश मेरे मम्मी पापा उस टाइम थोड़ा भी समझ लेते मुझे आगे पढ़ने लेते ।
तो ये दिन देखने नहीं पड़ते। M भी अपने पैरों पे खड़ी होती ।मेरी भी नौकरी लग गई होती। किसी के आगे हाथ नहीं फैलाने की जरूरत पड़ती। काश मेरे मम्मी पापा ने अपनी जिम्मेदारी तो निभा दी। मेरी पूरी जिंदगी एक बोझ बन के रह गई।एक जिम्मेदारी और निभा देते। मुझसे भी अपनी इच्छा पूछ लेते ।बेटा तू क्या करना चाहती तो आज मेरी जिंदगी नर्क जैसी ना होती। में दुनिया के हर माता पिता को यही कहना चाहूंगी। अपने बच्चों को समझे। उन्हें आगे बढ़ाने m स्पॉट करे। दुनिया और लोगों के चक्र मे उनकी जिंदगी को दाव पे ना लगाए।
नीलम सोनी फॉर्म ब्यावर




