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मातृभाषा की अवहेलना — डॉ. अनामिका दूबे “निधि”

 

अंग्रेज़ी न आने पर अपमान क्यों?
एक भाषा नहीं, एक मानसिक रोग
आज का समाज अजीब विडंबना से ग्रस्त है।
यहाँ ज्ञान की कसौटी भाषा बन गई है,
और भाषा की कसौटी— अंग्रेज़ी।
जिसे अंग्रेज़ी आती है, वह “सभ्य” कहलाता है,
और जिसे नहीं आती— वह “कम पढ़ा-लिखा”,
भले ही उसके पास अनुभव हो, समझ हो, संवेदना हो।
1. औपनिवेशिक मानसिकता की जड़ें
अंग्रेज़ी के प्रति यह अंधभक्ति अचानक पैदा नहीं हुई।
यह ब्रिटिश शासन की दी हुई विरासत है।
अंग्रेज़ों ने जाते-जाते हमें यह सिखा दिया कि
“हमारी भाषा श्रेष्ठ है, और तुम्हारी हीन।”
दुर्भाग्य यह है कि
आज़ादी के बाद भी हम मानसिक रूप से आज़ाद नहीं हुए।
हमने शासक बदल लिए,
पर सोच वही गुलामों वाली रखी।
2. भाषा नहीं, वर्ग का हथियार
अंग्रेज़ी आज केवल संवाद का माध्यम नहीं रही,
यह वर्ग-भेद का हथियार बन चुकी है।
अंग्रेज़ी जानने वाला “एलिट”
और मातृभाषा में सोचने वाला “लोकल”
यह विभाजन इतना गहरा है कि
लोग भाषा के आधार पर सम्मान बाँटने लगे हैं।
जब कोई व्यक्ति अंग्रेज़ी में हिचकता है,
तो लोग उसके ज्ञान पर नहीं,
उसके उच्चारण पर हँसते हैं—
यह अपमान नहीं, क्रूरता है।
3. शिक्षा व्यवस्था की विफलता
हमारी शिक्षा व्यवस्था ने भी आग में घी डाला है।
अच्छे स्कूल = अंग्रेज़ी माध्यम
सरकारी स्कूल = पिछड़ापन
यहाँ भाषा को अवसरों से जोड़ दिया गया।
नतीजा यह हुआ कि
जो अंग्रेज़ी नहीं जानता,
उसे अवसरों से पहले ही अयोग्य मान लिया जाता है।
क्या ज्ञान केवल अंग्रेज़ी में ही जन्म लेता है?
क्या बुद्धि का कोई उच्चारण होता है?
4. आत्महीनता और दिखावे की भूख
कई बार अपमान करने वाला व्यक्ति स्वयं असुरक्षित होता है।
वह अंग्रेज़ी को ढाल बनाकर
अपने भीतर की खालीपन को छुपाता है।
टूटी-फूटी अंग्रेज़ी बोलकर भी
लोग खुद को श्रेष्ठ समझने लगते हैं,
और सामने वाले को नीचा दिखाकर
अपना कद ऊँचा करने की कोशिश करते हैं।
यह भाषा का प्रेम नहीं,
अहंकार की बीमारी है।
5. मातृभाषा की अवहेलना— एक आत्मघात
जिस देश में कबीर, तुलसी, प्रेमचंद, निराला हुए,
वहाँ अपनी ही भाषा को हीन समझना
आत्मघात से कम नहीं।
भाषा केवल शब्द नहीं होती,
वह संस्कृति, स्मृति और संवेदना होती है।
जो व्यक्ति अपनी भाषा पर हँसता है,
वह दरअसल अपने अस्तित्व पर हँसता है।
6. समाधान क्या है?
भाषा को सम्मान से अलग करना होगा
अंग्रेज़ी को साधन बनाना होगा, सिंहासन नहीं
मातृभाषा में सोचने वालों को कमतर नहीं,
समृद्ध समझना होगा
शिक्षा और रोजगार में भाषायी विविधता को स्थान देना होगा
सबसे ज़रूरी—
अपमान की जगह संवाद, और श्रेष्ठता की जगह सहानुभूति।
निष्कर्ष
अंग्रेज़ी न आना कोई अपराध नहीं,
पर अंग्रेज़ी के नाम पर अपमान करना
ज़रूर एक अपराध है—
मानवता के ख़िलाफ़।
जिस समाज में भाषा के आधार पर सम्मान तय हो,
वहाँ शिक्षा नहीं,
घमंड पनपता है।
हमें तय करना होगा—
हमें अंग्रेज़ बनना है,
या एक बेहतर इंसान।

डॉ. अनामिका दूबे “निधि”

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