छोटी छोटी खुशियां — सुमन दुबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

सुबह का समय था। खिड़की से हल्की धूप कमरे में फैल रही थी और मैं अभी-अभी नींद से जागी ही थी। तभी अचानक एक छोटी सी गौरैया चिड़िया उड़ती हुई आई और मेरे बिस्तर पर आकर चुपचाप बैठ गई।
मैं हैरान होकर उसे देखने लगी। वह भी बिना डरे इधर-उधर गर्दन घुमाकर कमरे को निहार रही थी, जैसे कोई नई दुनिया में आई हो। उसके छोटे-छोटे पंख, चमकती आँखें और हल्की-सी चहचहाहट ने मेरे मन को खुशियों से भर दिया।
मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया, पर उसे डराना नहीं चाह चाहती थी। कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे समय थम गया हो—बस मैं और वह नन्ही मेहमान। फिर उसने हल्की सी फड़फड़ाहट की, एक बार मुझे देखा, और खिड़की से बाहर खुले आसमान में उड़ गई।
उस दिन मुझे एक बात समझ आई—खुशी हमेशा बड़ी चीज़ों में नहीं होती, कभी-कभी एक छोटी-सी चिड़िया भी दिल में बड़ी मुस्कान छोड़ जाती है।
सुमन दुबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




