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प्रेम बंधन या मुक्ति — राजेन्द्र परिहार सैनिक

प्रेम बंधन या मुक्ति — राजेन्द्र परिहार सैनिक

प्रेम प्रेम तो कहते हैं सभी,प्रेम अनुभूति सदाबहार।
प्रेम की महिमा है न्यारी, कोई नहीं पाया है पार।।

प्रेम सबसे सरल और सबसे गूढ़रहस्य भी है प्रेमानुभूति क्या है,इसे महानतम साहित्यविदों कवियों,दार्शनिकों ने प्रेम को परिभाषित किया है, लेकिन सर्वमान्य परिभाषा अब तक कोई गढ़ नहीं पाया है या यों कहें प्रेम का दायरा इतना विस्तृत है कि निश्चित शब्दों में नहीं पिरोया जा सकाहै।

प्रेम बंधन : क्या प्रेम एक बंधन है?? शाश्वत प्रेम बंधन तो कदापि नहीं हो सकता है। योजक हो सकता है किन्तु प्रेम को बंधन नहीं कहा जा सकता।प्रेम एक साधना है,एक आनंददायक अनुभूति है, हृदयों के मध्य संबंध स्थापित करता पावन अदृश्य तत्व है। आशक्ति, स्नेह, ममता वात्सल्य भक्ति भाव सभी में प्रेम भिन्न स्वरूपों में विद्यमान है। निश्चित ही है कि प्रेम बंधन नहीं है अपितु बंधन से मुक्त है।

प्रेम मुक्ति है..??

प्रेम स्वतंत्र मुक्ति भी नहीं है अपितु भवसागर से मुक्ति का सेतु अवश्य है! भक्ति का भाव तब तलक जागृत नहीं हो सकता है जब तक कि आत्मा में प्रेम का अभाव है, प्रेम वो शक्ति है जिससे परमात्म प्राप्ति अथवा परम मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। स्वयं श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग बताए हैं (१) ज्ञान व भक्ति मार्ग,(२) तपस्या व योग साधना मार्ग (३)प्रेम मार्ग..प्रथम दोनों मार्ग बहुत ही कठिन व जटिल मार्ग हैं जबकि प्रेम व पूर्ण समर्पण भाव सबसे सहज सरल व सुगम मार्ग है।अत: ये सत्य है प्रेम में ही मुक्ति भाव समाया हुआ है।

राजेन्द्र परिहार

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