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घर का लोकतंत्र और कामवाली का मंत्रालय– शिखा खुराना

कामवाली का मंत्रालय कामवालियों का इस सृष्टि में कितना महत्वपूर्ण स्थान है, यह तब पता चलता है जब वे एक दिन भी “आज नहीं आऊँगी” का संदेश दे देती हैं।

तुरंत घर का लोकतंत्र आपातकाल में बदल जाता है—झाड़ू कोने में मुँह फुलाए खड़ा होता है,पोंछा बाल्टी में डूबकर मौन साध लेता है,और बर्तनों का पहाड़ सिंक में हिमालय बनने लगता है।

तब समझ आता है कि घर की असली गृह मंत्रालय तो वही संभालती थीं, हम तो बस नाममात्र के मंत्री थे।

उनकी अनुपस्थिति हमें यह गूढ़ ज्ञान दे जाती है कि“घर चलाना भी किसी महाकाव्य से कम नहीं,और कामवाली बाई उसकी अनिवार्य नायिका है।”

सच कहें तो जहाँ उनकी रोज़ की रवानी रहती है, वहाँ घर बड़ा सुहाना लगता है,और जिस दिन वे छुट्टी पर हों, उस दिन रसोई, झाड़ू, बर्तन सब अपनी-अपनी मनमानी करने लगते हैं।

अतः निष्कर्ष यही है—सृष्टि के संतुलन में कामवालियों का स्थान भी कम वरदायिनी नहीं है।

एक दिन की अनुपस्थिति ही हमें विनम्रता से यह स्वीकार करवा देती है कि“बाई नहीं आई… तो आज हमारा इतिहास भी रसोई में ही लिखा जाएगा!”
जिस दिन छुट्टी की खबर सुनाए
रसोई में वीरानी है। तब मन श्रद्धा से कह उठता —हे श्रमदेवी! तुम महान हो,गृहस्थी रूपी इस सृष्टि की तुम ही असली भगवान हो।
इसलिए अब हम सबने मिलकर
एक नियम यह ठान लिया है—
बाई जब भी छुट्टी बोले,ु
तुरंत कहना — “आराम कीजिए… बस कल ज़रूर आ जाइए!”

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