हमारे समाज में पाखंड, दिखावा और फिजूलखर्ची,कर्ज में डूबता आम आदमी — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

हमारा समाज एक अजीब दोराहे पर खड़ा है।एकओर आधुनिकता की चकाचौंध है, तो दूसरी ओर भीतर ही भीतर फैलता खोखलापन, पाखंड, दिखावा और फिजूलखर्ची ने जैसे जीवन का नया मानदंड बना लिया है। जो जितना अधिक प्रदर्शन करता है, उसे उतना ही सफल समझ लिया जाता है। सादगी अब गुण नहीं, बल्कि कमजोरी मानी जाने लगी है।
शादियाँ उत्सव कम और प्रतिस्पर्धा अधिक बन गई हैं। रिश्तों की गर्माहट की जगह महंगे सजावटों ने ले ली है। लोग अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर केवल इस डर से कर्ज में डूब जाते हैं कि कहीं समाज उन्हें कमतर न आँक ले। कर्ज का बोझ केवल जेब पर नहीं, मन पर भी पड़ता है। चिंता, तनाव और आत्मग्लानि धीरे-धीरे परिवार की शांति को निगल जाते हैं।
पाखंड ने धर्म को भी आडंबर का वस्त्र पहना दिया है। बाहरी पूजा-पाठ और दिखावटी धार्मिक आयोजन तो बढ़ रहे हैं, पर भीतर की करुणा, सत्य और संयम जैसे लुप्त होते जा रहे हैं। सनातन की मूल भावना , सत्य, अहिंसा, धैर्य, कर्तव्य और संतुलन , कहीं पीछे छूटती प्रतीत होती है। हम परंपराओं का पालन तो करते हैं, पर उनके अर्थ से दूर होते जा रहे हैं।
वास्तव में सनातन कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि जीवन की सरल और संतुलित शैली है। यह हमें सिखाता है कि आवश्यकताओं को सीमित रखो, मन को निर्मल रखो और कर्म को श्रेष्ठ बनाओ। किंतु आज आवश्यकता से अधिक इच्छाओं ने जीवन को जटिल बना दिया है। तुलना की आग में जलता व्यक्ति स्वयं की शांति खो देता है।
समाधान बाहर नहीं, भीतर है। यदि हम दिखावे के स्थान पर सादगी को अपनाएँ, प्रतिस्पर्धा के स्थान पर सहयोग को महत्व दें और धर्म को बाहरी आडंबर के बजाय आचरण में उतारें, तो बहुत कुछ बदल सकता है। समाज का उत्थान बड़े आयोजनों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ईमानदार प्रयासों से होता है।
समय आ गया है कि हम चमक से अधिक चरित्र को महत्व दें, खर्च से अधिक संस्कार को और दिखावे से अधिक सत्य को। तभी हम कर्ज और कुंठा के इस चक्र से मुक्त होकर एक संतुलित, शांत और सार्थक जीवन की ओर लौट सकेंगे।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




