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मेरे बचपन का मिट्ठू तोता — सुमन दूबे सांऊखोर बड़हलगंज गोरखपुर

 

एक समय की बात थीं। वह समय लगभग जून या जुलाई का महीना था। अचानक मौसम बदलता है।
और हवा चली घाघरा उठाए, धूल उड़ी सभी पत्ते छोटे-2 कण हवा में उड़ने लगें इन हवाओ का रुख झंझावात तूफ़ानों में बदल गया। सभी मनुष्य अपने घरों में खिडकी दरखाजे बन्द कर छूप गये। लेकिन बेचारे उन पक्षियों का तो क्या कहे क्या-क्या उन घोंसलों पर बीता तूफानी हवा ने कितने वृक्ष उखाड़ फेंके इस मंजर के बीच
कितनो के घर (घोंसले) उजड़ गये । थोडी देर में किरन को रोशनी लिए सूर्य का आगमन होता है।

मेरा छोटा भाई राजेश उस समय प्रकृति का मंजर देखने बागीचे में निकला था। अचानक एक झंझावात से दुखी ‘तोता’ जो चोट के कारण कराह रहा था ।उसकी नजर उस तोते पर पड़ी राजेश विना कुछ सोचे-विचारे उस तोते को घर उठा लाया।

उस तोते को देखकर मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ पड़ी हम दोनो भाई- वहन ने सोचा इस तोते की देख भाल करेंगें, उस तोते के पंख पर गहरी चोट लगी थी चोट पर मरहम लगाया गया तथा रात भर उसे एक बड़ी टोकरी के नीचे छुपाकर देख-रेख की गई सुबह होते ही हम दोनो पिता जी से उस तोते के रहने का इन्तजाम करवाया पिता जी हम दोनो का उत्साह देखकर एक बड़ा-सा पिजड़ा ले आए उसे तोता का नाम हमने मिट्ठू रखा अब वह पिंजरे में रहता और कुछ न कुछ खाया करता। एक दिन दोपहर के समय मैं सो रही थी अचानक उस तोते ने आवाज लगाई मिट्ठू सीता – राम कह , राधेश्याम राधेश्याम यह सुनकर बहुत ही आश्चर्य हुआ लेकिन अगले पल ही समझ में आया कि यह तोता किसी के घर है। फिर क्या कहने एक दिन अचानक बाहर निकल आया। लेकिन लेकिन उड़ नहीं सकता यह हमें जानकारी हुआ अब वह पिंजरे से हर रोज बाहर निकाल दिया जाता और वह मन सबके थाली में खाना खाने लगा। समय बितते गया और एक दिन अचानक उसे बिल्ली ने पंजा मारा और मिट्ठू गोलोकवासी हो गया सबने अत्यंत दुख ब्यक्त किया। फिर उसे मिट्टी में दफना दिया।अब मिट्ठू यादों में आज तक जीवित है।

(स्वरचित)

सुमन दूबे सांऊखोर
बड़हलगंज गोरखपुर

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