प्रकृति का प्रकोप: मानव की लापरवाही का विनाशकारी परिणाम – जे पी शर्मा

मानव ने विज्ञान और तकनीक के सहारे विकास की ऊँचाइयों को छुआ है, लेकिन इस विकास की दौड़ में वह प्रकृति के साथ खिलवाड़ भी करता जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, नदियों का प्रदूषण, पहाड़ों का दोहन और बढ़ता धुआँ आज धरती के अस्तित्व पर ही संकट बनकर खड़ा हो गया है। यदि समय रहते मनुष्य नहीं संभला, तो प्रकृति का यह क्रोध पूरी मानव सभ्यता के लिए बहुत महंगा साबित होगा।
आज मौसम का असंतुलन पूरी दुनिया महसूस कर रही है। कहीं भीषण गर्मी लोगों का जीना मुश्किल कर रही है, तो कहीं अचानक आई बाढ़ तबाही मचा रही है। जंगलों की कटाई के कारण वर्षा का चक्र प्रभावित हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। यह सब प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम है। मनुष्य अपनी सुविधाओं के लिए लगातार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहा है। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग, फैक्ट्रियों से निकलता जहरीला धुआँ और रासायनिक कचरा पर्यावरण को विषैला बना रहा है। इसका प्रभाव केवल धरती पर ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। नई-नई बीमारियाँ, शुद्ध हवा और पानी की कमी आज गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं।
प्रकृति हमें बिना किसी भेदभाव के जीवन देती है। पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, नदियाँ जल देती हैं और धरती अन्न प्रदान करती है। लेकिन बदले में मनुष्य प्रकृति को केवल विनाश दे रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा, पानी और हरियाली केवल किताबों और तस्वीरों में ही देखने को मिलेगी।
अब समय आ गया है कि हम प्रकृति संरक्षण को अपना कर्तव्य समझें। अधिक से अधिक वृक्षारोपण करें, जल संरक्षण करें, प्लास्टिक का उपयोग कम करें और पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक बनाएं। छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े बदलाव ला सकते हैं। प्रकृति माँ है, और माँ के साथ खिलवाड़ कभी सुखद परिणाम नहीं देता। यदि मानव ने अभी भी चेतावनी को नहीं समझा, तो प्रकृति का प्रकोप इतना भयंकर होगा कि उसकी भरपाई संभव नहीं होगी। इसलिए हमें याद रखना चाहिए कि प्रकृति से खिलवाड़ बहुत महंगा पड़ेगा।