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आज के बच्चे — बिन्दू अग्रवाल की कलम से

मेरे जीवन में हमेशा, बच्चे सब से ज्यादा महत्वपूर्ण रहे। मैंने अधिक समय बच्चों के साथ गुजारा है इस अनुभव से मैं बच्चों के मन में कब क्या चल रहा है कई बार उनसे बातें करते हुए उनके मन की कोमलता को समझ जाती हूँ।
जिस की मुझे इश्वर ने प्रेरणा दी कि उनके लिए मैं कुछ अच्छा कर सकूँ! उनके बेहतरीन भविष्य में मुझे कुछ चीजे सही नहीं लगती इसलिये मै आज के बच्चों के बारे में बोलना चाहती हूँ।
अभी मैंने दो प्वाइंट नोटिस किये है उस पर मैं बात करना चाहती हूँ जो कि मुझे लगता है आने वाले समय में बच्चे इसे और ज्यादा पीड़ित होने वाले है मुझे लगा इसे रोकना बहुत जरूरी है।
मेरा पहला प्वाइंट ये है-
आज का समय बहुत तेजी से भाग रहा है लोग इसी में खो गए पीछे मुड़कर के कोई नहीं देखता।
हमारे समय में पच्चीस पैसा, पचास पैसा का सिक्का चलता था उसकी हम चाकलेट लेके संतुष्ट होते थे उसके बाद भी हम गुल्लक भरते थे हमें बड़े परिश्रम के बाद अपने शौक पूरे करते थे।
आज का समय ऐसा है, माता पिता कहते हैं हम बच्चों को पैसा देके आदत खराब नहीं करते पर उनकी सोच से ज्यादा उनकी डीमांड से ज्यादा उनको ऐसे फास्ट फूड इतनी अधिक मात्रा में दिया जाता है कि उन्हें घर का खाना खाने की इच्छा ही नही होती।
आज के स्कूल जाने वाले बच्चे घर से टिफिन नही ले जाते माँ से कहते है, अगर भूख लगी तो केन्टीन से कुछ हल्का खा लेंगे और यह कहकर माँ से बोलेगें पापा से पैसे दिलाओ और तुरंत माता -पिता बच्चों की बात मान जाते है।
पिज़्ज़ा बर्गर और फ्राइज़ फैंसी चाकलेट और अलग अलग फ्लेवर की आइसक्रीम खिलाते है फिर बच्चों को शिक्षा देते हैं, दो टाइम ब्रश करो हमारे माता पिता ने कभी नहीं कहा कि दो टाइम ब्रश करो।
आज बच्चा दो टाइम ब्रश करता है उसके बाद भी दांतो मे सड़न आ रही है।
आज हम खुद पैतालिस की उम्र में दांतो से गन्ना छील के खाते है और अखरोट तोड़ते हैं। क्या आज का बच्चा कर सकता है‌‌? मैं किसी को चैलेंज नही करना चाहती मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूँ मोतियों से दांत हमे भगवान ने दिया हमें इसकी केयर करनी चाहिए क्योंकि दांतो के होने से शरीर को पूरा पोषण मिलता है। हम हर चीज चबाके खा सकते है और दांतों के वजह से शरीर में ताकत रहती है।
मेरा दूसरा प्वाइंट ये है-
पहले पैरेंट्स बच्चों में अनुशासन रखते थे और बच्चों के काम निर्धारित होते थे लड़कों को बाहर के काम सिखाएं जाते थे और लड़कियों को घर के काम सिखाएं जाते थे। पैरेंट्स जब बाजार करने जाते तो आठ से दस वर्ष के बच्चों को साथ लेकर जाते और उनको वहां से सामान देके घर भेजते और वो वहां से काम में जाते और माँ लड़कियों को घर के काम सिखाती और इसके अलावा कोई भी छोटे-मोटे काम पहले से निर्धारित रहते थे कि ये काम बच्चे करेंगे उनके बावजूद बच्चों पर पूरा ध्यान पढ़ाई पर भी रहता। आज हमारे बच्चों को इतनी सुविधा दी जाती हैं कि बच्चों के स्कूल बैग में जो भी बुक्स कापियां हैं उनके तीन हिस्से किये गए पहला स्कूल में जमा होता है कुछ दूसरा घर पर रहता है कुछ तीसरा स्कूल बैग में रहता है उसके बाद भी बच्चा स्कूल बैग नहीं उठाता उनके पैरेंट्स स्कूल बैग उठाते हैं। इसके अलावा बच्चे सुबह जब उठते हैं तो उनको टूथ ब्रश कराने से लेकर रात होने तक बच्चे के हर एक काम के लिए हमेशा खड़े रहते हैं। बच्चों को कोई भी काम करने की आदत नहीं डलवाते है। मैंने कई बच्चों को देखा है तेरह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को मैने देखा वो खुद से खाना तक नहीं खाते उनकी मम्मी खाना खिलाती है। आज पैरेंट्स बच्चों की इतनी केयर करते हैं उसके बाद भी बच्चे पैरेंट्स को रिस्पेक्ट नहीं देते है न बड़ो का पैर छूना, न ही बड़ो की बात मानना। बडे़ कुछ भी बोले उनको उल्टा जबाब तुरंत मिल जाता है। पूरा टाइम मम्मी पापा बच्चों के परवरिश और बच्चों के पढ़ाई को लेकर परेशान रहते हैं। उसके बाद भी बच्चों को कोई परवाह नहीं रहती है। न ही इनमें कोई संस्कार आ रहे ,न ही कोई परिश्रम कर पा रहे‌। आज के बच्चों को हर वो चीज मिलती है जो वो चाहते है उसके बाद भी वो न ज्यादा चल पा रहे न ही वो कोई वजन उठा पा रहे आज के बच्चे शारीरिक रूप से
कमज़ोर बन रहे हैं।
-बिन्दू अग्रवाल (स्वरचित, मौलिक)

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