तृप्ति की बूंद और अतृप्ति का महासागर -डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा

‘
मानव जीवन का सुख बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि आंतरिक मनःस्थिति पर निर्भर करता है। अक़्सर हम भौतिक साधनों और उपलब्धियों की ख़ोज में बाहर भागते हैं, लेकिन सच्ची तृप्ति बाहरी प्रचुरता में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और कृतज्ञता में निहित है।
जब मन तृप्त होता है, तो जल की एक छोटी सी बूंद भी असीम आनंद और संतोष दे देती है। इसके विपरीत, अतृप्त मन के सामने खु़शियों का महासागर होने पर भी वह प्यासा ही रहता है, क्योंकि इच्छाओं की कोई सीमा नहीं होती। आधुनिक युग में सुख-सुविधाएं बढ़ने पर भी तनाव और अकेलापन इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि हम निरंतर अभाव की दौड़ में लगे रहते हैं।
निष्कर्षतः, सच्ची समृद्धि का पैमाना यह नहीं कि हमारे पास कितना है, बल्कि यह है कि हम अपनी स्थिति से कितने संतुष्ट हैं। तृप्त मन के लिए हर पल उत्सव है, जबकि अतृप्त मन के लिए पूरी दुनिया का वैभव भी व्यर्थ है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’




