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वह ठंडियों की दोपहरी – डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

वह ठंडियों की दोपहरी – डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

,#वह सर्दियों की दोपहरी सुहावना सुखद श्यामला खेत , हरी भरी धरती, वाह खूबसूरत ,#जाड़े की दुपहरी में गुनगुनी गुनगुनी धूप।गांव की दोपहरी सर्दी में बहुत ही सुंदर लुभावना सुहावना मौसम होता है।
हरे भरे खेत फूली फूली, सरसों मूली के हरे हरे, पत्ते पालक गोभी मेंथी, झरबरी झूली ,मिर्ची गुच्छा लगे होते हैं। अत्यंत आनंदित भाव विभोर हो जाता है। प्रकृति का मनोरम चित्रणदेखकर।
पास ही गाय बैल पशु बंधे हुए हैं, कुआं भी पास में है,रस्सी बाल्टी रखी , गांव की महिलाएं पनिहारियों पानी भरती हुई घूंघट की ओट में, घूंघट उठा कर के देखी और पगडंडी पर चल पड़ती है अपने घर की ओर।
मुन्ना -मुन्नी दौड़- दौड़ कर खेत खलिहानों के बीच दौड़कर खेल रहे हैं, पास ही किसान अपना कार्य कर रहे हैं मध्यम मध्यम सर्दी के हवा के झोंके सुहावने लगते हैं।
काका बैठे हुए हैं काकी मां सिर पर पोटली रखके खाना लेकर आई हैं ,बिछाकर एक पटका बैठ जाता है पूरा परिवार खाना खोलकर मक्के की रोटी चने का साग खाकर तृप्ति और रहट का पानी बहुत हीमीठा।
छोटी बेटी मुनिया धीरे-धीरे स्वेटर बनाना सीख रही है गांव में उनकी मैडम ने सिखाया है बुनना, बैठी है ऊन सिलाई धीरे-धीरे बुन रही है।
धीरे-धीरे सूर्य अस्त होता है किसान अपने गाय बैल को लेकर के घर की ओर, अब धीरे से मोर कूंका,लगता सूर्य अस्त हुआ।
यह हल्की-हल्की धूप कभी न जाए हल्का-हल्का गर्माहट वाह!!! क्या आनंदित समा !!!
सुखद सुहानी जाडे की दोपहर, सुखद ग्रामीण अंचल की धीमी दोपहर की धूप आनंदित करती।

डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

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