कुछ दर्द कहे नहीं जाते – राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

कुछ दर्द कहे नहीं जाते हैंं,
कुछ दर्द बस सहे जाते हैं!!
कहते हैं कि दर्द बांटने से कम हो जाते हैं,लेकिन कुछ दर्द
बांटे भी नहीं जा सकते हैं और दिल की गहराइयों में कहीं
कसकते रहते हैं। जीवन में कुछ दुर्घटनाएं ऐसी घटित हो
जाती हैं, कि उन्हें शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है केवल
महसूस किया जा सकता है। हादसे की भयानकता को
हम जितनी गहराई से महसूस कर पाते हैं,कोई और नही
महसूस कर सकता है।
बात बहुत पुरानी है किन्तु ऐसी हक़ीक़त है जिसे स्मरण
करता हूं तो मेरे रोम रोम में दहशत की लहर दौड़ पड़ती
है, और मन व्यथित हो जाता है। मैं तब अवयस्क ही था।
लगभग १२-१३ का अल्हड़ बुद्धि बालक। मुझे लोकल
ट्रेन से अपने घर की ओर जाना था। तब पुलिया या पारपथ
की व्यवस्था नहीं थी। ट्रेन प्लेटफार्म पर आने को थी और
सीट मिलने की चाह में लोग बाग ट्रेन के दोनों तरफ भीड़
लगाए हुए थे। मुझे भीड़ भाड़ में चढ़ना पसंद नहीं था सो
मैं प्लेटफार्म पर ही खड़ा हुआ था। बहुत से लोग दूसरी
लाइन के बीच में भी खड़े हुए थे।कहते हैं मौत और मुसीबत
बताकर नहीं आती हैं। अचानक दूसरी लाइन से एक ट्रेन
जो शायद सुपर फास्ट थी। दनदनाती हुई गुजर गई और कई
लोगों को कुचलती हुई निकल गई, पीछे छोड़ गई लाशों के
ढेर। किसी की टांगें कटकर अलग हुई, किसी का सर धड़ से
जुदा हो गया था। जो मर गये वो तो चिर शांत हो गये किन्तु
कटे हुए अंग भंग हुए लोगों की दर्दनाक कराहटें और वो
खून सनी लाशें देखकर मैं तो जैसे सुन्न पड़ गया था। दिमाग
चकरा गया था कि अचानक ही क्या से क्या हो गया।तब मैं
बच्चा ही तो था। वहां मचे कोहराम और चीखो-पुकार को
बर्दाश्त नहीं कर पाया। आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए
मैं रेलवे स्टेशन से बाहर निकल आया।कई दिनों तक यूं ही
सदमे की हालत में रहा। अब भी वो दुर्घटना चलचित्र की
भांति मेरे मानस पटल पर अंकित हो चुकी है।सच है कि
कुछ दर्द कहे नहीं जाते।
राजेन्द्र परिहार “सैनिक”



