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जिंदगी एक कुल्फी है- कविता साव पश्चिम बंगाल

 

जिंदगी भी एक कुल्फी की तरह है—धीरे-धीरे पिघलती हुई। फर्क बस इतना है कि कुल्फी के पिघलने का हमें पता रहता है, लेकिन जिंदगी के पिघलते समय हम अक्सर बेखबर रहते हैं। हम सोचते रहते हैं कि अभी बहुत वक्त है, कल कर लेंगे, फिर कभी जी लेंगे, कभी अपने लोगों के साथ बैठेंगे, कभी मन की बात कहेंगे। इसी ‘कभी’ के इंतजार में जिंदगी का स्वाद हमारे हाथ से टपकता चला जाता है।

कुल्फी सामने हो तो दो ही रास्ते हैं—उसे स्वाद लेकर खा लो या फिर उसे पिघलकर व्यर्थ बह जाने दो। जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है। उसे किस तरह जीना है, यह फैसला हमारा है। शिकायतों में घोलना है, दूसरों से तुलना करते हुए बिताना है, बीते कल को ढोते रहना है या फिर जो आज मिला है, उसका भरपूर स्वाद लेना है—चुनाव हमारा है।

यह जरूरी नहीं कि जिंदगी हमेशा मनचाही मिठास दे। कभी उसमें रिश्तों की कसक होगी, कभी असफलता की कड़वाहट, कभी अकेलेपन की उदासी और कभी अनपेक्षित खुशियों की मिठास। मगर कुल्फी चाहे जैसी हो, जब तक हाथ में है, उसका स्वाद लिया जा सकता है। जिंदगी भी जब तक हमारे पास है, तब तक उसमें अर्थ, प्रेम, हँसी, सीख और संतोष के कुछ पल जरूर तलाशे जा सकते हैं।

इसलिए जिंदगी को वेस्ट करने से बेहतर है कि उसे टेस्ट किया जाए। हर दिन को परिपूर्ण बनाने की कोशिश मत कीजिए; बस उसे महसूस कीजिए। किसी अपने से दो शब्द प्रेम के बोलिए, किसी जरूरतमंद के चेहरे पर मुस्कान लाइए, अपनी पसंद का कोई काम कीजिए और कभी-कभी बिना किसी कारण के भी खुश हो लीजिए।

क्योंकि सच यही है—कुल्फी हो या जिंदगी, दोनों पिघलनी तय हैं। सवाल यह नहीं कि वह कितनी देर में पिघलेगी; असली सवाल यह है कि पिघलने से पहले हमने उसका स्वाद कितना जाना।

जिंदगी मिली है तो उसे केवल काटिए मत, चखिए भी।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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