पतिदेव का सार्वभौमिक गौरवान्वित अधिकार – शिखा खुराना कुमुदिनी

मैंने तय कर लिया है कि अब मैं भी अपने पति के पति होने पर गर्व करूँगी।
आखिर पतियों के पास गर्व करने के इतने कारण हैं कि पत्नी होकर भी कभी-कभी मुझे अपने ज्ञान पर संदेह होने लगता है। जिस काम को करने के लिए पत्नी को सुबह से शाम तक खटना पड़ता है, उसी काम को पति दो मिनट में तुच्छ घोषित कर देते हैं। ऐसी विलक्षण प्रतिभा पर गर्व तो बनता ही है!
मेरे पतिदेव को अपने पति होने पर विशेष गर्व है। उनका मानना है कि घर चलाना कोई बहुत बड़ा काम नहीं है। असली काम तो बाहर की दुनिया में होता है। घर में क्या रखा है? चार दीवारें, कुछ बर्तन, थोड़ा-सा राशन, कुछ कपड़े और पत्नी! बस, इन्हीं से तो गृहस्थी बन जाती है। अब इसमें कौन-सा रॉकेट विज्ञान छिपा है?
सुबह आँख खुलते ही उनका पहला कर्तव्य होता है पत्नी को आवाज़ देना।
“सुनती हो! चाय मिलेगी?”
चाय मिल जाए तो कप उठाकर पूछेंगे, “आज नाश्ते में क्या है?”
नाश्ता सामने आ जाए तो अख़बार खोलकर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर चिंता करने लगेंगे। देश कहाँ जा रहा है, महँगाई क्यों बढ़ रही है, युवाओं को रोजगार क्यों नहीं मिल रहा, सरकार क्या कर रही है, इन सब विषयों पर उनके विचार इतने गंभीर होते हैं कि बीच में यह पूछना भी राष्ट्रहित के विरुद्ध लगता है कि साहब, अपना कप सिंक में रख देंगे क्या?
कप रखने की बात सुनते ही उनका चेहरा ऐसा हो जाता है, मानो पत्नी ने उनसे घर के बजट के बजाय देश का पूरा कर्ज़ चुकाने को कह दिया हो।
“अरे, यह भी कोई काम है? रख दूँगा!”
और फिर वह कप वहीं रखा रहता है, जहाँ से उठाया गया था। पतिदेव का आश्वासन भी कप की तरह स्थिर रहता है, अपनी जगह से हिलता ही नहीं!
खाना बनाने की बात पर तो उनके तर्कों का कोई मुकाबला ही नहीं।
“खाना बनाना कौन-सा मुश्किल काम है? गैस जलाओ, कुकर चढ़ाओ, मसाले डालो और हो गया खाना!”
मैंने एक दिन विनम्रता से पूछा, “तो आज आप ही बना दीजिए।”
बोले, “आज तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”
मैंने कहा, “कल बना दीजिएगा।”
बोले, “कल ऑफिस में बहुत काम है।”
रविवार का नाम लिया तो बोले, “रविवार आराम करने के लिए होता है।”
तब मुझे समझ आया कि खाना बनाना सचमुच चुटकियों का काम है, बस उन चुटकियों को बजाने के लिए पत्नी की उँगलियाँ ही बनी हैं!
पतिदेव की दृष्टि में रसोई में खड़े होकर खाना बनाना कोई विशेष योग्यता नहीं। हाँ, सोफे पर बैठकर यह बताना कि दाल में नमक कम है, सब्ज़ी में मसाला अधिक है और रोटी थोड़ी मोटी है, यह स्वाद विशेषज्ञ होने का प्रमाण अवश्य है।
रोटी गोल न बने तो पत्नी की पाक-कला पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। रोटी जल जाए तो उसकी लापरवाही का राष्ट्रीय प्रसारण हो जाता है। लेकिन कभी पति से रोटी बनाने का अनुरोध कर दीजिए, तो वे पहले ही स्पष्ट कर देंगे कि उनकी विशेषज्ञता खाने में है, बनाने में नहीं!
वाह रे हुनर! काम किए बिना ही विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र हासिल है।
घर सँवारने की बात हो तो पतिदेव का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुँच जाता है।
“घर सँवारने में तुमने किया ही क्या है? झाड़ू-पोंछा तो कामवाली कर जाती है। कपड़े धोने की मशीन है। बर्तन धोने की मशीन भी आ गई है। अब तुम्हें करना ही क्या पड़ता है?”
मैंने मन ही मन सोचा कि काश, रिश्तों को सँभालने की भी कोई मशीन होती! उसमें पति का अहंकार डालते, जिम्मेदारियों का बटन दबाते और सुबह तक एक संवेदनशील इंसान तैयार हो जाता।
लेकिन अफ़सोस! ऐसी मशीन अभी बाज़ार में उपलब्ध नहीं है।
घर में राशन समाप्त हो जाए तो पत्नी की भूल। दूध न आए तो पत्नी की लापरवाही। बच्चे की फीस जमा न हो तो पत्नी को पहले से ध्यान रखना चाहिए था। बिजली का बिल अधिक आ जाए तो पत्नी को बिजली बचानी चाहिए थी। रिश्तेदार आने वाले हों तो पत्नी को तैयारी करनी चाहिए थी। मेहमान चले जाएँ तो बिखरा घर भी पत्नी की ही जिम्मेदारी!
और इन सबके बीच पतिदेव का योगदान?
“मुझे बताया क्यों नहीं?”
यह वाक्य उनके वैवाहिक जीवन का ब्रह्मास्त्र है। पत्नी ने बताया तो कहते हैं, “हर बात के लिए मुझे परेशान मत किया करो।” नहीं बताया तो कहते हैं, “तुम मुझे कुछ बताती ही नहीं!”
अर्थात् पत्नी का कर्तव्य है कि वह सब कुछ बताए भी और पति को परेशान भी न करे। गृहस्थी चलाने के साथ-साथ उसे पतिदेव के मूड, समय, सुविधा और प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगाने की अतिरिक्त योग्यता भी रखनी चाहिए।
मैंने एक दिन साहस करके पूछ ही लिया, “आपने इस घर के लिए किया क्या है?”
बस, इतना सुनना था कि उनका आत्मसम्मान घायल हो गया।
“क्या मतलब? मैं दिन-रात मेहनत किसके लिए करता हूँ? घर किसका है? परिवार किसका है? खर्च कौन उठाता है?”
मैंने कहा, “आपकी मेहनत और योगदान का सम्मान है। लेकिन घर केवल पैसों से तो नहीं चलता। घर को घर बनाने में समय, श्रम, धैर्य और भावनाएँ भी लगती हैं।”
वे हँस पड़े।
“यह सब तो घर-गृहस्थी का सामान्य काम है। इसमें कौन-सी उपलब्धि है?”
मैंने सोचा, सचमुच! पत्नी का काम सामान्य है। उसकी थकान सामान्य है। उसकी नींद अधूरी रह जाना सामान्य है। अपनी पसंद टाल देना सामान्य है। अपनी बीमारी में भी रसोई सँभालना सामान्य है। सबकी जरूरतें याद रखना सामान्य है। सबके चेहरे पढ़ लेना, बिना कहे उनकी परेशानियाँ समझ लेना और अपनी परेशानी को मुस्कान के पीछे छिपा लेना भी सामान्य है।
असामान्य तो केवल पति की थकान है, जिसे घर पहुँचते ही विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए!
पतिदेव ऑफिस से लौटें तो उन्हें शांति चाहिए। पत्नी दिनभर घर सँभालकर बैठी हो तो उन्हें शिकायत मिलती है—“तुम्हें तो घर पर ही रहना होता है, फिर थकान कैसी?”
घर पर रहना शायद कोई ऐसी विलक्षण चिकित्सा पद्धति है, जिसमें व्यक्ति काम करते हुए भी ऊर्जा से भरपूर रहता है। काश, इस पद्धति का लाभ उन पतियों को भी मिल पाता जो छुट्टी के दिन बिस्तर से उठने में भी श्रम की पराकाष्ठा का अनुभव करते हैं!
एक दिन मैंने घर के सारे कामों की सूची बनाकर उनके सामने रख दी। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, बच्चों की जरूरतों से लेकर बुज़ुर्गों की दवाइयों तक, राशन की सूची से लेकर घरेलू खर्च के हिसाब तक, सब कुछ लिखा था।
वे सूची देखकर बोले, “इतना भी कोई काम नहीं होता है?”
मैंने कहा, “नहीं, बिल्कुल नहीं। आप बस एक दिन करके देख लीजिए।”
उन्होंने सूची को एक तरफ रखा और बोले, “तुम बेकार की बातों को मुद्दा बना देती हो।”
मैंने उसी क्षण स्वीकार कर लिया कि मेरी गलती थी। मुझे काम की सूची नहीं बनानी चाहिए थी। मुझे तो उनके सामने उन कामों की प्रदर्शनी लगानी चाहिए थी, जिन्हें वे रोज़ इस्तेमाल करते हैं और जिनके अस्तित्व पर कभी विचार नहीं करते।
सुबह उठते ही बिस्तर व्यवस्थित मिलता है। नहाने के लिए तौलिया मिलता है। अलमारी में कपड़े मिलते हैं। खाने की मेज़ पर भोजन मिलता है। ज़रूरत की चीज़ें सही जगह पर मिलती हैं। कोई समस्या आती है तो पत्नी से समाधान की अपेक्षा रहती है।
यह सब अपने-आप होता है, ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल में इंटरनेट अपने-आप चलने लगता है। बस अंतर इतना है कि मोबाइल का रिचार्ज समाप्त हो जाए तो पता चल जाता है, लेकिन पत्नी की ऊर्जा समाप्त होने लगे तो उसे समझाया जाता है कि छोटी-छोटी बातों को दिल पर नहीं लेना चाहिए।
पतिदेव को अपने अधिकारों का पूरा ज्ञान है। उन्हें समय पर खाना चाहिए, साफ कपड़े चाहिए, व्यवस्थित घर चाहिए, सम्मान चाहिए, आराम चाहिए और उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
लेकिन जब पत्नी को सम्मान, सहयोग और कुछ समय अपने लिए चाहिए, तो उन्हें लगता है कि घर में कोई नया विभाग खोलने की माँग की जा रही है।
वे कहते हैं, “तुम्हें चाहिए क्या आखिर? सब कुछ तो है तुम्हारे पास!”
मैं पूछना चाहती हूँ—क्या घर में मौजूद हर वस्तु पत्नी की अपनी उपलब्धि है? क्या सुविधाएँ मिल जाने से उसके श्रम का मूल्य समाप्त हो जाता है? क्या परिवार के लिए किया गया काम इसलिए अदृश्य हो जाता है कि उसके बदले वेतन नहीं मिलता?
पतिदेव को यह समझाना कठिन है कि घर सँवारने का अर्थ केवल सामान सही जगह रखना नहीं होता। घर में रहने वाले लोगों के बीच संबंध सँभालना, छोटी-छोटी बातों पर बिगड़ते वातावरण को ठीक करना, सबकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखना और अनेक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखना भी उसी काम का हिस्सा है।
पर यह सब दिखाई कहाँ देता है!
घर चमकता हुआ मिले तो लगता है कि सब सामान्य है। खाना समय पर मिले तो लगता है कि यह तो होना ही चाहिए। कपड़े तैयार मिलें तो लगता है कि अलमारी में कपड़े अपने-आप पहुँचते होंगे। पत्नी बीमार पड़ जाए और काम रुक जाए, तभी घर को पता चलता है कि व्यवस्था के पीछे कोई इंसान भी था।
और फिर पतिदेव बड़े गर्व से कहते हैं, “तुम्हारे बिना घर का काम चलता ही नहीं!”
इस वाक्य में प्रेम भी हो सकता है, प्रशंसा भी, लेकिन यदि इसके बाद भी जिम्मेदारियों में कोई बदलाव न आए, तो यह प्रशंसा कम और आजीवन नियुक्ति-पत्र अधिक लगता है, वह भी बिना वेतन, बिना छुट्टी और बिना सेवानिवृत्ति लाभ के!
मैंने अब तय किया है कि मैं भी अपने काम पर गर्व करूँगी। लेकिन उससे पहले पतिदेव को एक छोटी-सी सलाह देना चाहती हूँ।
अगली बार जब आप कहें कि खाना बनाना चुटकियों का काम है, तो उन चुटकियों से एक पूरा भोजन बनाकर दिखाइए। जब कहें कि घर सँवारने में पत्नी ने किया ही क्या है, तो एक सप्ताह घर की व्यवस्था सँभालकर देखिए। और जब कहें कि पत्नी दिनभर घर पर रहती है, तो कभी उसकी दिनचर्या को भी अपनी दिनचर्या जितना महत्त्व देकर देखिए।
हो सकता है, तब आपको पता चले कि घर चलाने के लिए केवल कमाने वाला होना पर्याप्त नहीं, जिम्मेदारी बाँटने वाला होना भी आवश्यक है।
और हाँ, पतिदेव! पत्नी आपके योगदान को छोटा नहीं कर रही। वह केवल अपने योगदान को छोटा कहलाने से इनकार कर रही है।
क्योंकि विवाह कोई ऐसी संस्था नहीं, जिसमें एक व्यक्ति आजीवन सेवाएँ प्रदान करे और दूसरा आजीवन उनका मूल्यांकन करता रहे।
यह साझेदारी है, जहाँ श्रम का सम्मान हो, जिम्मेदारियों का बँटवारा हो और अधिकारों के साथ कर्तव्यों की भी याद रहे।
फिलहाल पतिदेव सोफे पर बैठे चाय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैंने भी तय कर लिया है कि आज उन्हें आत्मनिर्भरता का थोड़ा अभ्यास कराया जाए।
चाय की केतली रसोई में है, कप अलमारी में हैं और चीनी के डिब्बे पर साफ-साफ लिखा है—‘चीनी’।
देखती हूँ, आज उनके ज्ञान, अनुभव और विलक्षण प्रबंधन-कौशल का कितना उपयोग होता है!
आखिर जिस काम को वे चुटकियों का खेल मानते हैं, उसमें आज उन्हें भी अपनी चुटकियाँ आज़माने का अवसर मिलना चाहिए।
गर्व करने का अधिकार सबको है, लेकिन दूसरों के श्रम को तुच्छ समझकर गर्व करने का अधिकार किसी को नहीं!
शिखा खुराना कुमुदिनी




