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पत्नी ही परमेश्वर है  — अरविंद शर्मा अजनवी की कलम से 

 

बहुत भटका जीवन मेरा,
बगिया-बगिया फूल चुने,
कभी किसी मुस्कान में खोया,
कभी नयनों के जाल बुने।

कभी किसी के गीतों में,
मन ने मीठे राग रचे,
पर लौटा जब भी अंतर्मन,
तब आँसू चुपचाप बहे।

कहीं मधुर थे बोल किसी के,
पर सब थे छाया समान,
ना विश्वास, ना साथ निभाए,
ना जीवन का कोई वरदान।

कुछ ने बंधन तोड़ दिए खुद,
कुछ ने छल का जाल बुना,
कहीं स्वार्थ की रेखाएँ थीं,
कहीं मोह का भ्रम पला।

बाबू, जानू, दिल के राजा,
बस अभिनय के शब्द रहे,
ना श्रद्धा, ना सच्चा स्नेह था,
ना भावों के अर्थ खुले।

प्रेम युग की प्रीत कथा में,
क्षण भर का अनुराग मिला,
कभी पत्रों की प्रतीक्षा थी,
कभी लिफ़ाफ़ा लौट चला।

तब मिली मेरी जीवन संगिनी,
सात फेरों का अर्थ खुला,
जिस क्षण उसने हाथ थामा,
मन में हर संशय धुला।

तब लौटा मैं थका हारा,
सब भ्रम छलों को छोड़,
जहाँ न कोई शर्त बची थी,
न क्रोध, न पीड़ा, न जोर।

वह खड़ी रही मौन तपस्विनी,
नेत्रों में गहराई थी,
ना कोई प्रश्न, न अभिव्यक्ति,
बस करुणा ही छाई थी।

उसके आलिंगन में पाया,
ब्रह्मांड समाया एक भाव,
उसकी चुप्पी बोल उठी जब,
मौन बना संजीवनी छाव।

अब ना चाहिए तीर्थों के पथ,
ना कथा, न मंत्र, विधान,
उसके बाहों में मिलता है,
शांति, प्रेम और पूर्ण ज्ञान।

वही मेरी काशी बन बैठी,
वही मथुरा, वही काबा,
उसकी हँसी में लहराती है,
वेदों की सच्ची परिभाषा।

अब पत्नी ही आराध्य बनी है,
उसमें दिखता देव समान,
जिसके स्नेह और सेवा में,
खुलता आत्मा का द्वार महान।

वही लक्ष्मी, वही सरस्वती,
वही दुर्गा, शक्ति प्रधान,
जिसने मेरे सूने मन में,
भर दी प्रीति, दिया संज्ञान।

अब सबसे कहना चाहता हूँ,
हे नर-नारी, सुन लो बात,
जो जीवन साथी में प्रभु देखे,
कट जाए जीवन की रात।

ना मंदिर, ना व्रत, ना पूजा,
ना मूर्तियों की अब है आस,
जिसने नारी में प्रभु पहचाना,
उसे मिला सच्चा प्रकाश।

पत्नी ही जीवन की तीर्थ,
पत्नी ही ईश्वर का ज्ञान,
जिसने उसको प्रेम से पूजा,
उसने पा लिया पूर्ण ब्रह्मज्ञान।

अरविंद शर्मा अजनबी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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