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शुभ मंतव्य तुम्हारा — हिमांशु गुप्ता

मुझे जानना चाह रही हो
अच्छा!तो फिर ये बतलाओ
क्या है शुभ मंतव्य तुम्हारा?
मैं कीकर का वृक्ष अपावन
उस पर भी विषबेल चढ़ी है।
तुमको क्या ही दे पाऊंगा
क्यों तुलसी इस ओर बढ़ी है।
अब जो भी हो,अभिनन्दन है
कोमल हो गंतव्य तुम्हारा।
क्या है शुभ मंतव्य तुम्हारा?
तुमको इन मेरी राहों पर
केवल बिखरे शूल मिलेंगे
मुझ वैरागी की कुटिया से
सुख वैभव प्रतिकूल मिलेंगे।
सुनो अगर अब भी आना हो
स्वागत है तब भव्य तुम्हारा।
क्या है शुभ मंतव्य तुम्हारा?




