चाय की टपरी — रमेश शर्मा

शीला अम्मा की गांव के बाहर मुख्य सड़क पर चाय की टपरी थी। जिसमें वह छोटा मोटा खाने पीने का सामान रखती थी और राह से गुजरने वालों के लिए चाय बना कर पिला देती थी। घर की हालत ज्यादा अच्छी नहीं थी। पहले इसे उनके पति रामप्रसाद जी चलाया करते थे। एक बेटा था। जो नौकरी की तलाश में शहर गया था। वह एक दुर्घटना में गुज़र गया। उसके गम में पिछले तीन महीने पहले शीला अम्मा के पति श्री राम प्रसाद जी भी गुजर गए।
घर में खाने पीने के सामान की समस्या होने लगा। बेचारी अम्मा कबतक अपने पति की मौत का शोक मनाती। आखिर दो समय की रोटी की जुगाड़ के लिए उन्हें यह दुकान संभालनी पड़ी।
ज्यादा भाग दौड़ इस अवस्था में उनके बस की नहीं थी इसलिए थोड़ा बहुत खाने पीने का सामान रखकर किसी तरह अपना गुजारा कर रही थी।
एक दिन उनकी दुकान पर एक युवक आया बहुत परेशान था। ऐसा लग रहा था जैसे कई दिनों से ढंग से कुछ खाया पिया ना हो। उन्हें अपने बेटे की याद आ गई। उन्होंने उसे चाय बना कर दी। साथ में खाने के लिए बिस्कुट का पैकेट दिया। वह बोला माता जी मेरे पास पैसे नहीं हैं। अम्मा बोली कोई बात नहीं। थोड़ी देर बाद अम्मा ने उसके घर परिवार के बारे में पूछा। वह बोला मैं अनाथ हूँ पास के शहर में एक कारखाने में काम करता था। कुछ दिन पहले उसमें आग लग गई। सबकुछ जल गया। मालिक ने हमें नौकरी से निकाल दिया। मैं नौकरी की तलाश में यहाँ भटकता हुआ आ पहुंचा।
अम्मा बोली कोई बात नहीं अब तुम मेरे साथ रहो और इस चाय की टपरी को चलाने में मेरी मदद करो।
इस तरह अम्मा को जीने का सहारा मिल गया और उस युवक की परिवार एवं रोजगार मिल गया।
रमेश शर्मा




