मैं लिखती हूं_ डॉ सरिता चौहान

उसके दर्द भरे दिल को,
उसके आहट को लिखती हूं।।
उसके दिल में प्यार छुपा जो,
उसकी धड़कन को लिखती हूं।।
उसकी सांसों में बस कर मै,
उसकी बातों को लिखती हूं।।
उन लम्हों को उन यादों को,
दिल में बस कर लिखती हूं।।
कहते थे तुम मेरी हो,
दिल की धड़कन में रहती हो।।
आज न जाने क्या हो गया,
अनजाने अनजाने से रहते हो।।
रात सुहानी नई भोर मे,
मुझको ना पहचान सके।।
तेरे इस अफ़साने में,
आहें भर भर कर जीती हूं।।
भीगी पलकें गीला तन है,
जब से मिला तुझसे मेरा मन है।।
मन में तन में नयन में बस कर,
हर पल मुझको ही छलते हो।।
इस छलिया की यही कहानी,
तेरी यादों को लिखती हूं।।
कोरे कागज के पन्नों पर,
तेरी प्रेम कहानी लिखती हूं।
दिल में बस कर दर्द दिया जो,
उस दीवाने को लिखती हूं।।
मीठी- मीठी बातें उसकी,
उस दोहरेपन को लिखती हूं
लिख ना सकी जो मैं उसको तो,
कौन उसे पढ़ पाएगा।।
इस छलिया इस बलिया का
कोई भी पार ना पायेगा।
कहते थे तुम मेरी हो,
मेरे दिल की धड़कन हो।।
मेरे तन -मन- प्राणों में,
तुम ही तुम बसती हो।।
बसती थी मैं हर पन्नो में,
स्याही -स्याही सी छपती थी।।
उसकी तारीफों में मैं थी,
कागज भी कम पड़ती थी।।
आज उन्हें यादों में खोकर,
बीती बातों को लिखती हूं।।
बीते पल के याद सुनहरे,
उन यादों को मैं लिखती हूं।।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान
गोरखपुर उत्तर प्रदेश




