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पहली पिक्चर — रमेश शर्मा

 

बात उन दिनों की है जब मैं छठी कक्षा में पढ़ता था। आज से पचास साल पहले। मनोरंजन के कोई साधन नहीं हुआ करते थे। रेडियो पर ही सारे कार्यक्रम समाचार, नाटक, क्रिकेट कमेंटरी, गाने बिनाका गीत माला आदि आते थे। घर में रेडियो होना भी एक बड़ी बात होती थी।
आने जाने के लिए घर में एक साईकिल होती थी। जिससे पिता जी आफिस जाते थे और कभी कभार हमें घुमाने ले जाते थे। वरना अधिकर पैदल या सरकारी लोकल से आना जाना होता था।
एक बार हमारी बड़ी बहन जी और जीजा जी पहली बार सिकंदराबाद यूपी से जयपुर एक हफ्ते की छुट्टियों में आये। वे सिकंदराबाद में एक सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। हमारी बहन जी गृहणी थी।
एक दिन हम जयपुर में हवा महल, सिटी पैलेस और जंतरमंतर देख कर आये। दूसरे दिन आमेर का किला देखकर आये। तीसरे दिन जीजा जी बोले आज तीन से छ: न्यू गेट के पास प्रेम प्रकाश टाकीज में दिलीप कुमार की गोरा काला पिक्चर देखने चलेंगे। दोपहर एक बजे हम लोग बनीपार्क से कलेक्ट्रेट सर्किल आये वहाँ से लोकल बस में बैठ कर न्यू गेट गए। वहाँ पास में ही प्रेम प्रकाश टाकीज में जाकर लाइन में लगकर चार ड्रेस सर्किल की टिकट ली। और सिनेमा हॉल में जाकर अपनी सीटों पर बैठ गए। मैंने यह पहली पिक्चर सिनेमा हॉल में देखी थी। बहुत मजा आया। बड़ा पर्दा उसपर दिलीप कुमार को देखना बहुत अच्छा लगा।
शाम को बस पकड़ कर घर आ गए।
रमेश शर्मा

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