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बातें पुरानी — डाॅ .ममता परिहार बलरामपुर

 

उन सभी मातृशक्तियो को समर्पित जो स्मृतियों मे मायके को साथ लेकर दाम्पत्य का उत्तरदायित्व निभाती रहती है।
समीक्षा अवश्य करें

बहुत याद आती हैं बातें पुरानी,
कहाँँ तक रहे कैद आँखों में पानी।।

वो बाबुल का आँगन,वो बाहों के झूले,
थी मन में उमंगे गगन जाके छू लें।
वो माँ की रसोई का छोटा सा कोना,
जहाँ हमने सीखा है इंसान होना।
बनाती थी भोजन सिखाती पहाड़ा,
है ये रंग हल्का है वो रंग गाढा।
क्या पूजा की थाली,क्या होली दीवाली,
ये तुलसी का चौरा,वो बगिया वो माली।।
बताया है सबकुछ सुनाकर कहानी…
बहुत याद आती है बातें पुरानी….।

वो बारिश के बूंँदों में गिरना उछलना ,
वो चिड़िया वो बुलबुल वो तितली पकड़ना।
घरौंदें में गुड़िया की सारी गृहस्थी
रचाते स्वयंवर करें खूब मस्ती ।
वो बरगद की बगिया में अगहन का मेला,
वो झुमके वो पायल हो जादू का खेला।
थी गुल्लक के पैसे में मिट्टी की खुशबू ,
छिपाते थे माँ से बनाते थे बुद्धू ।
रटाती थीं दादी भजन सब जुबानी
बहुत याद आती है बातें पुरानी ।।

लगा अपना आंँगन उसी दिन पराया ,
दुपट्टे को जब मांँ ने आंँचल बनाया ।
वो पापा के आने पर नज़रें झुकाना ,
हृदय की व्यथा को हृदय में छुपाना ।
वो दादी के आंँचल में छुपकर सिसकना,
वो माँ से अकेले में कसकर लिपटना ।
थी माँ की निगाहों में गहरी उदासी ,
छिपाती रहे फिर भी रहती रूआँसी ,
मै पापा की गुड़िया हुई क्यों सयानी,
बहुत याद आती हैं बातें पुरानी
कहाँ तक रहे कैद आँखो मे पानी।।

मौलिक/स्वरचित
डाॅ .ममता परिहार
बलरामपुर

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