लोगों को टैक्स भरने की मशीन समझना बंद करें सरकारें

आज के जमाने में आम नागरिक खुद को एक इंसान से ज्यादा “टैक्स भरने की मशीन” महसूस करने लगा है। उसकी मेहनत, उसके सपने और उसकी जरूरतें कहीं न कहीं सरकारी नीतियों और बढ़ते करों के बोझ तले दबती जा रही हैं।
जबकि
सरकार का काम केवल कर इकट्ठा करना नहीं, बल्कि उन टैक्स का सही और पारदर्शी उपयोग करना भी है। जब नागरिक देखता है कि उसके द्वारा चुकाया गया टैक्स शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं में ढंग से नहीं लग रहा, तो उसके मन में असंतोष पैदा होता है।
हम सब जानते हैं
हर व्यक्ति दिन-रात मेहनत करता है—अपना घर चलाने के लिए, बच्चों की पढ़ाई के लिए, और बेहतर भविष्य के लिए। ऐसे में अत्यधिक करों का बोझ उसकी आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित कर देता है। सरकार को चाहिए कि वह नागरिकों को केवल राजस्व का साधन नहीं माने, बल्कि देश के विकास का साझेदार समझे।
हमारा मानना है कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य होनी चाहिये । जब सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, तो कर भी नागरिक कर्तव्य की तरह स्वीकार किए जाते हैं, बोझ की तरह नहीं समझे जाते हैं।
टैक्स प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो विकास को गति दे, लेकिन आम आदमी की कमर न तोड़े। संतुलित नीति, संवेदनशील प्रशासन और ईमानदार क्रियान्वयन ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान हैं।
नागरिक कोई मशीन नहीं है। वह इस राष्ट्र की आत्मा है। यदि शासन उसकी गरिमा और मेहनत का सम्मान करेगा, तो वही नागरिक देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।
शिक्षाविद् एवं अधिवक्ता दीपक शर्मा ।




