महाशिवरात्रि पर स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान की भव्य काव्य संध्या संपन्न।

जयपुर। महाशिवरात्रि के पावन उपलक्ष्य में स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान, जयपुर (राजस्थान) के तत्वावधान में 13 फ़रवरी 2026 को सायं 4 बजे संस्थान के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर भव्य काव्य संध्या का आयोजन किया गया। कार्यक्रम पूर्णतः शिवमय वातावरण में सम्पन्न हुआ, जिसमें शिव आराधना, स्तुति एवं भक्ति गीतों की मनोहारी प्रस्तुतियाँ दी गईं। डॉ कुसुम शर्मा की अध्यक्षता में अर्चना माथुर ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की व अनुराधा का सुन्दर संचालन में
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. रेखा गुप्ता द्वारा भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों के श्लोक-पाठ से हुआ। तत्पश्चात उन्होंने भावपूर्ण स्वर में भजन प्रस्तुत किया —
“भगवान शिव भोले के चरणों में आई मैं शरण में,
आज रखो मेरी लाज…”
उनकी प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया।
इसके पश्चात सुनीता त्रिपाठी ‘अजय’ ने अपनी पुस्तक “शिव तेरी अर्धांगिनी” से काव्य पाठ करते हुए शिव-पार्वती के दिव्य संबंध का वर्णन किया —
“शिव तेरी अर्धांगिनी, बनी तेरी अर्धांगिनी…”
उनकी ओजपूर्ण एवं भावनात्मक प्रस्तुति को श्रोताओं ने अत्यंत सराहा।
पुष्पा माथुर ने “कर्पूर गौरं करुणावतारम्” स्तुति के साथ अपने पति द्वारा रचित रचना की पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं —
“भोले भंडारी हैं शिव शंकर,
करुणा के सागर…”
जिससे सभा में भक्ति का भाव और प्रगाढ़ हो गया।
अर्चना माथुर ने महाशिवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए अपनी रचना प्रस्तुत की —
“आ गया अद्भुत संयोग दिन मास शिवरात्रि का…”
उन्होंने शिवरात्रि के व्रत, पूजा और ज्योतिर्लिंगों के महत्व पर भी सारगर्भित जानकारी दी।
अनुराधा माथुर ने संस्कृत में हरिगीतिका छंद पर आधारित स्तुति प्रस्तुत की —
महादेव स्तुति
महादेव शीश मयंक धर ,भागीरथी जटा शोभिती। ललाट मध्य चक्षु धारते, त्रिनेत्र धारी कहायते। ।
उनकी संस्कृत वाणी ने कार्यक्रम को विशिष्ट गरिमा प्रदान की।
रजनी मिश्रा ने महाशिवरात्रि के पर्व की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वर्तमान पीढ़ी को संस्कारों एवं आध्यात्मिकता से जुड़ने का संदेश दिया।
प्रो. कुसुम शर्मा ने अपनी स्तुति में श्रद्धाभाव प्रकट करते हुए कहा —
“नमन करूँ भोलेनाथ नतमस्तक,
सुनिए मेरी पुकार…”
उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
कार्यक्रम के अंत में ज्ञानवती सक्सेना ने अपनी भावपूर्ण पंक्तियों के साथ काव्य संध्या को विराम दिया —
“हे शिव शंकर अविकारी,ज
नीलकंठ निराकारी…”
समस्त कार्यक्रम शिवभक्ति, साहित्यिक गरिमा एवं आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण रहा।



