केसाराम दहिया : एक पिता-तुल्य स्नेह की सजीव विरासत.

लगभग चौदह वर्ष पहले की वह पहली मुलाकात आज भी याद है। जब मैं श्रीगंगानगर के सेक्टर-8 में आया, तो केसाराम दहिया जी के घर के सामने वाले घर में सबसे ऊपरी मंजिल पर हमें कमरा मिला। मेरा घर उनके ठीक सामने था। यह निकटता महज दूरी की बात नहीं थी—यह एक गहरे भावनात्मक रिश्ते की शुरुआत थी।
धीरे-धीरे उनके सरल स्वभाव, विनम्र व्यवहार और स्नेहपूर्ण मुस्कान ने मुझे उनके परिवार का हिस्सा बना दिया।
उनकी धर्मपत्नी मंजू दहिया जी, और उनके तीनों बच्चों—धर्मेंद्र, पुष्पेंद्र और उनकी बहन दीपिका —सबके साथ एक पारिवारिक लगाव बन गया। उनके घर का आँगन मेरे लिए दूसरा घर बन चुका था। आना-जाना, बातें करना, हँसना-रोना—सब कुछ इतना स्वाभाविक हो गया कि समय का पता ही नहीं चलता था।
केसाराम दहिया जी का जीवन देखकर समझ आया कि सच्ची सामाजिकता क्या होती है। वे जाति-पाँति, पद-प्रतिष्ठा या आर्थिक स्थिति के किसी भी बंधन में नहीं बँधे थे। किसी का दुख देखते ही वह उनका अपना दुख बन जाता था। कितने ही परिवारों को उन्होंने अपने समझाने-बुझाने से टूटने से बचा लिया। कई बार उनके साथ विभिन्न घरों में जाना हुआ—हर जगह एक ही छवि: शांत, संयमी, लेकिन दृढ़। वे राजा-दरबार की तरह नहीं, बल्कि एक सच्चे मध्यस्थ की तरह काम करते थे।उनका घर एक अनौपचारिक संस्थान-सा था। सुबह से शाम तक लोगों का आना-जाना लगा रहता। बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि—अर्जुन मेघवाल जी, कुलदीप इंदौरा जी, निहालचंद मेघवाल, गोविंद राम मेघवाल, अंकुर मिगलानी जी, परसराम भाटिया जी जैसे नेता; पूर्व आईजी आरपी सिंह जी, डीटीओ श्रीगंगानगर के श्री राम जी, सीताराम चौरडिया जी, पूर्व कलेक्टर साहब और आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारी—सब उनके आँगन में आते और एक अनोखा अपनेपन महसूस करते।
यह सब उनके सादगीपूर्ण जीवन और निश्छल हृदय का ही कमाल था।उनकी दिनचर्या भी अनुकरणीय थी। सुबह-सुबह पार्क में योग, फिर दिनभर समाज-सेवा।
सेक्टर-8 के निवासी उन्हें गाँव के बुजुर्ग की तरह सम्मान देते थे। कोई भी समस्या हो—चाहे वह सेक्टर की हो या शहर की—लोग सबसे पहले उनसे सलाह लेते। और वे बिना देर किए संबंधित विभाग में जाकर उसका समाधान करवाते।
पर्यावरण के प्रति उनका प्रेम भी देखते ही बनता था। उन्होंने अपने घर के आसपास और सेक्टर में इतने पेड़ लगवाए कि आज भी वह हरियाली उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए है।
मंजू दहिया जी का स्नेह भी कम नहीं था। घर में कोई भी आता, बिना चाय-पानी के जाने नहीं देती थीं। मेरे लिए तो यह घर अपना ही हो गया था। उनके दोनों बेटों—धर्मेंद्र दहिया और पुष्पेंद्र दहिया—के बच्चों के साथ हमारा रिश्ता इतना गहरा हो गया कि हम उनके लालन-पालन में ताऊ-ताई की तरह शामिल रहते।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं। उनकी कमी हर पल खलती है। फिर भी, अंतिम समय में मैंने उन्हें वचन दिया था कि उनके दिखाए सिद्धांत—सादगी, सेवा, निष्पक्षता और स्नेह—को हम अपने जीवन में उतारेंगे। गरीबों की मदद, समाज-सेवा और सच्चाई का मार्ग हमारा धर्म बनेगा। दहिया जी, आपका भौतिक रूप भले ही हमसे दूर हो गया हो, पर आपके संस्कार, आपके विचार और आपका स्नेह हमारे रग-रग में बस्ता है। यही आपकी अमर विरासत है—एक सरल हृदय की, जो आज भी अनगिनत लोगों को प्रेरित करता है।— एक आपका अपना, घनश्याम शर्मा




