Uncategorized

प्यारी बिटिया रानी, (पत्र) — अलका गर्ग

 

शुक्रिया …मेरी ज़िंदगी में आने के लिए..शुक्रिया मुझे फिर से अपना स्वर्णिम बचपन याद दिलाने के लिए…तुम सोच भी नहीं सकतीं अपने शरीर का एक चलता फिरता,हँसता खेलता अंग देख कर कैसी अनुभूति होती है..तुमने मुझे उस असीम परमानंद की अनुभूति कराई।
जब तुमने जन्म लिया तब मैं बेहोश थी। जब होश आया तो मैं पूरी तरह से सचेत नहीं थी। मुझे लगा मैं ख़ुद के स्वरूप को ही ख़ुद की बग़ल में लेटा हुए देख रही हूँ। वह एहसास आज इतने बरस बाद भी मुझे रोमांचित कर देता है।
अब सुनो पढ़ाई और बाक़ी काम तो तुम बखूबी कर ही रही हो। अब थोड़ी सी घर की भी ज़िम्मेदारी सम्हाल लो बेटा ये सब तुम्हें अपने आगे आने वाले जीवन में बहुत काम आयेगा जब तुम अपना परिवार सम्भालोगी। अभी पापा और बहन की देखभाल से तुम्हें जिम्मेदारी उठाना और सब कुछ सम्हालना आ जाएगा। मैं नहीं चाहती मेरी ग़लतियाँ तुम दोहराओ। बड़ी मुश्किल हुई थी मुझे घर, परिवार और बच्चे के बीच तारतम्य बैठाने में।
थोड़ा समय समाज, देश और मानव जाति की सेवा में भी देना। जिससे ले रहे हैं उसको लौटना भी तो हमारा फ़र्ज़ है ना। विनम्रता,करुणा,लज्जा लड़कियों के गहने हैं इनको धारण करना।
बेटा डायरी के कुछ पन्नों में लिख कर मैंने अपने मन की बात अपनी प्यारी बेटी को बताने की कोशिश की है। तुम मेधावी हो समझ जाओगी और मुझे पूरी उम्मीद है कि अपने जीवन में ज़रूर अपनाओगी।
मैं रहूँ या ना रहूँ,तुम मेरी इस डायरी को अपनी प्यारी सहेली की तरह हमेशा अपने साथ रखना।

तुम्हारी माँ..
अलका गर्ग, गुरुग्राम

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!