अतिरिक्त सूचनावाद : सूचना क्रांति से जन्मी नई सामाजिक महामारी — अभिषेक कुमार शर्मा

21वी सदी का एक चौथाई भाग समाप्त हो चुका है और इस सदी के छोटे से काल खंड ने ही हमें एक बीमारी से अवगत करवा दिया है जिससे तुंरत निपटना अत्यंत आवश्यक है, वो है अतिरिक्त सूचनावाद । ये एक महामारी है जो जंगल की आग की तरह फैल रही है और धीरे धीरे ये पूरी मानव सभ्यता को इसने अपनी चपेट में ले लिया है। सूचना क्रांति जिसका समूचे विश्व ने बाहें फैलाकर स्वागत किया था उसी सूचना क्रांति ने आज महामारी का रूप ले लिया है और जिस तरह हर बीमारी का एक वाहक होता है इस का भी है और वो एक नहीं दो है पहला तो मोबाइल और दूसरा उसके अंतर्निहित सोशल मीडिया।
अतिरिक्त सूचनावाद से मेरा अभिप्राय ऐसी सूचनाओं से है जिनसे हमारा प्रत्यक्षतः कोई संबंध नहीं होता पर चूंकि हम इस सोशल मीडिया के ग्राहक हैं। हम ये सूचनाएं प्राप्त करते रहते हैं। हम सीधे तौर पर ये कभी स्वीकार नहीं करते कि ये सूचनाएं हमारे मन मस्तिष्क पर कितना घातक प्रभाव डाल रही हैं।
ये सूचनाएं हमे अपंग बनाए जा रही हैं। हम अधीर होते चले जा रहे हैं। आज का मनुष्य ज़रा ज़रा सी बात पर मरने मारने पर उतारू हैं। विवेक, परिस्थिति को आंकने की शक्ति और धैर्य समाप्त होता जा रहा है और ये सब समाज में अपराधों के बढ़ने का कारण बन रहा है।
सिर्फ इतना ही नहीं, ये असंबंध सूचनाओं का जाल अपने आप के लिए भी घातक है। आज का मनुष्य बेवजह परेशान रहने लगा है। हमारी बाधाओं से लड़ने, उनका सामना करने की क्षमता समाप्त हो रही है। ज़रा ज़रा सी बात पर लोग फंदों से लटक रहे हैं या ट्रेन से कट कर मर रहे हैं। ” कुछ अच्छा नहीं लग रहा ” क्या ये बात आत्महत्या कर लेने का कारण हो सकती है? हमें गंभीरता से इस बारे में सोचना होगा।
हम ऐसी सूचना के तंत्र में जी रहे हैं जहां आवश्यकता पड़ने पर यदि किसी ऐप पर खरीदने के लिए आप टेबल ढूंढेंगे तो वो ऐप सजेशन में रस्सी का विकल्प ये कहके प्रदर्शित करेगी यू मे ओल्सो नीड।
इस अतिरिक्त सूचनावाद से समाज में वैमनस्यता बढ़ती जा रही है। अलग अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर छद्म वीरों का एक जाल सा बिछा हुआ है। ये छद्म वीर इन स्थानों पर जहर उगल रहे हैं और आज के द्वंद्वयुक्त युवा उनके आसानी से शिकार हो रहे हैं।
हमारे पड़ोसी देशों में हमने तथाकथित जेन जी द्वारा आयोजित हिंसक आंदोलन देखे हैं और उनका क्या परिणाम निकला वो हमारे सामने है।
व्यक्तिगत तौर पर देखा जाए तो इस अतिरिक्त सूचनावाद से हमारी याददाश्त पर काफी असर हुआ है। हम उन सब क्षेत्रों में हमारा ध्यान, समय और धन का व्यय कर रहे हैं जिनसे हम सीधे तौर पर संबंधित ही नहीं है।
आभासी दुनिया में मित्र बनाने की होड में हम अकेले होते जा रहे हैं। आज का मनुष्य भुलक्कड़ भी हो गया है। मोबाइल पर निर्भरता इतनी ज्यादा हो गई है कि इसके बिना जी पाना संभव प्रतीत नहीं होता।
आत्मविश्वास का स्तर इतना गिर गया है कि हमारी सामाजिकता समाप्त हो रही है। अधिकतर लोग एक दूसरे से मिलने से घबराने लगे हैं। दो मिनट बात करने में दिक्कत महसूस होने लगती है। आंख मिलाकर बात करने में घबराहट होने लगती है। हम झट से जेब से मोबाइल हाथ में ले लेते है और उसकी स्क्रीन में हमें सुरक्षित महसूस होता है।जल्द ही ‘ मोबाइल की लत छुड़वाओ केंद्र ‘ आम बात हो जाएगी।
ये बीमारी लाइलाज नहीं हैं। इसका इलाज भी है और वो कोई विज्ञान की प्रयोगशाला से नहीं बल्कि हम और आपके बीच से निकलेगा। हमें मोबाइल उपयोग के घंटे तय करने होंगे। हमें अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। असंबंध सूचनाओं को नकारना सीखना पड़ेगा। योग प्राणायाम को अपनाकर एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करना होगा। जिस प्रकार कुसंगत को छोड़ा जाता है उसी प्रकार अनावश्यक सोशल मीडिया उपस्थिति को त्यागना पड़ेगा। हमें सच्चे मित्र बनाने होंगे जिनसे हम अपने मन बांट सकें क्योंकि सच्चे मित्र हमे उन सभी परेशानियों का हल दे सकते हैं जो कोई AI या सर्च इंजन कभी नहीं दे सकते।




