प्रकृति संरक्षण ( संस्मरण ) – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

एक दिन बारिश के बाद की सुबह कुछ अलग ही थी। मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में घुली हुई थी और पेड़ों की पत्तियाँ मोतियों की तरह चमक रही थीं। मैं अपने घर के पीछे वाले छोटे से मैदान में टहलने निकली। बचपन में यही जगह हरी-भरी हुआ करती थी, लेकिन अब वहाँ कचरे के ढेर और सूखे पेड़ों के अवशेष दिखाई दे रहे थे।
चलते-चलते मेरी नज़र एक छोटे से पौधे पर पड़ी, जो पत्थरों और गंदगी के बीच भी सीधा खड़ा था।
उसे देखकर ऐसा लगा जैसे वह चुपचाप कह रहा हो—”अगर तुम मेरा साथ दो, तो मैं फिर से इस जगह को हरा-भरा बना सकता हूँ।”कुछ पल मैं वहां ठहरी और अनायास युक्त उसे प्रकृति की ओर चल पड़ी उस पल मेरा मन कुछ बदल सा गया।
मैंने उसी दिन से तय कर लिया कि इस जगह को फिर से जीवित बनाऊँगी।
शुरुआत आसान नहीं थी। लोगों ने हँसी उड़ाई, कहा कि मंदबुद्धि व्यक्ति ऐसे ही होते हैं जो अनायास ही इस वीरान जगह के स्वच्छता में लगे हुए हैं “अकेले से क्या होगा?” लेकिन मैंने हार नहीं मानी। रोज़ थोड़ा-थोड़ा कचरा साफ करती, पौधों को पानी देती और नए पौधे लगाती। धीरे-धीरे मेरे कुछ दोस्त भी मेरे साथ जुड़ गए।
कुछ महीनों बाद वही सूना मैदान फिर से हरियाली से भरने लगा। पक्षियों की आवाज़ें लौट आईं, और ठंडी हवा फिर से बहने लगी। जब मैं उस जगह खड़े होकर यह बदलाव देखती, तो मन गर्व और खुशी से भर जाता।
मैं प्रकृति की गोद में कैसे सुख महसूस करती हूं यह बता पाना असंभव सा है,अनायास है जब अपने छोटे से बगिया में प्रवेश करती हूं ऐसा लगता है कि मुझे जन्नत की सुकून मिल रही है।
नन्हे-नन्हे पौधों को मैं वृक्षों में बदलते हुए देखती हूं ।प्रतिदिन उसके साथ में उसके आत्मीयता से लगी रहती हूं उसके छोटे-छोटे पत्ते ऐसे लगता कि जैसे उनकी छोटी-छोटी उंगलियां हो और वह पौधे अपनी बाहें फैलाए मुझे बुला रहे हो।
लोग सच्च ही कहते हैं जैसा नाम वैसा का मेरे जीवन पर इसका काफी असर पड़ा है। मुझे ऐसा लगता जैसे हर डाली कि वह फूल मुस्कुरा कर मुझसे बातें कर रही हो उनका मेरे हृदय से कोई पुराना नाता हो, वह भी मुझे देखे बिना मुरझाए नजर आते हैं क्या आपने कभी सोचा है,या प्रकृति की छांव में बैठकर आनंद लिया । इन नन्हे पौधों के बीच में छोटी-छोटी चिड़िया घूमती रहती है ,जब भी वृक्षों को पानी दीजिए। पानी पीने के लिए भी दौड़ पड़ती है। इससे केवल हम ही नहीं संरक्षित हो रहे हैं बहुत ही पंक्षी छोटे-छोटे जीव भी अत्यंत आत्मियता के साथ वहां पानी पीने उपस्थित हो जाते हैं यही जीवन का मूल मंत्र है। की छोटे-छोटे चीजों को भी हम देख कर प्रसन्न हो वृक्ष सुरक्षित ,जीव -जंतु सुरक्षित इस बीच में हम भी सुरक्षित रह सकेंगे।
सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




