रंग बदलते लोग -उर्मिला पाण्डेय उर्मि
आज कल कलयुग में रंग बदलना साधारण सी बात है ज्यादातर बड़े बड़े सेठ नेता रंग बदलते देखे गये हैं।
लेकिन गजब की बात है कि विद्या के मंदिर में बैठे हुए लोग भी रंग बदलते देखे गये हैं विद्यालयों और किसी भी प्राइवेट विभाग में लोग पल पल पर मुकर जाते हैं किसी की योग्यता अनुभव पर ध्यान न देकर अपना पराया चलाते हैं वाह रे कलयुग अब परोपकार भलाई करने का तो जमाना ही नहीं रहा।
अच्छा आदमी तो मूर्ख समझा जाता है उसकी कोई इज्जत नहीं। जिसमें हजारों बुराइयां भरीं हुईं हैं उसे है अच्छा समझा जाता है उसकी ही चलती है।
एक समय ऐसा था जब व्यक्ति दूसरे का भला करते थकता नहीं था अब जितना किसी को सताया जाए उतना ही अच्छा समझा जाता है।
एक विद्यालय की बात है वहां पर हिंदी एवं संस्कृत की योग्य विदुषी अध्यापिका अनुभव शील विद्यालय में गयीं उनका अनुभव होने पर भी उनको विद्यालय में नहीं रखा गया। आज-कल योग्यता नहीं ऊपरी चमक दमक शान शौकत बन ठन के रहना देखा जाता है। लेकिन ध्यान रहे लाल गूदड़ो में नहीं छिपते।अंत उभरते वही हैं।
लेकिन लोगों को अपना रंग बदलते देर नहीं लगती।
अक्सर करके नेता लोग रंग बदलते हैं वोट बैंक मजबूत करने के लिए वह कुछ भी दांव पेंच लड़ाते हैं अपनी बहू बेटियों की इज्जत चली जाए तो चली जाए पर वोठ बैंक मजबूत करो ऐसा आजकल देखा गया है।
राजनीति में तो ये सब चलता है लेकिन अब सभी जगह व्यक्ति रंग बदलते हैं।
उर्मिला पाण्डेय उर्मि




