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मेरी पहली काव्य  – रमेश शर्मा

 

मैं पिछले कई वर्षों से मुक्तक कविता भजन शायरी लिखता आ रहा है। दो साल पहले मन में विचार आया कि क्यों न अपनी किताब छपवा ली जाए। उसके लिए मैंने अपनी रचनाओं को आवश्यक सुधार के साथ क्रमबद्ध किया।
हमारे एक मित्र हैं जो एक साहित्यिक संस्था के संस्थापक हैं। उनसे मैंने संपर्क किया और इस विषय में बात की। उन्होंने कहा मेरे एक जानकर प्रकाशन हैं उनसे बात करके बताता हूँ। उन्होंने बताया कि काम हो जायेगा एक माह का समय लगेगा। उन्होंने प्रकाशन राशि बताई। हमने उन्हें वह राशि भेज दी। साथ ही अपनी रचनाएँ भेज दी। सौ पेज की किताब छपने की बात थी।
एक माह गुजर जाने के बाद हमने उनसे इस विषय में प्रगति पूछी। उन्होंने बताया कि प्रकाशक फोन नहीं उठा रहे हैं। उन्होंने वह अग्रिम राशि हमें खेद के साथ वापस कर दी। फिर हमने दूसरे प्रकाशक से बात की। उन्हें अपनी रचनाएँ और तय राशि भेज दी। पंद्रह दिन में उन्होंने हमारी किताब “एक पैगाम माँ के नाम” प्रकाशित कर हमें सूचना दे दी। कि आपकी किताब बिक्री के लिए आन लाईन उपलब्ध है। हमनें दस किताबों के खरीदने का आर्डर और साथ में पैसे भेजे। एक हफ्ते में हमारे पास किताबें आ गई।
हमनें अपनी किताब का विमोचन हमारी कंपनी के निदेशक श्री अनिरुद्ध गोस्वामी जी से करवा कर बाकी किताबें अपने इष्ट मित्रों और जानकारों को सप्रेम भेंट कर दी।
वाकई अपनी रचनाएँ एक किताब में छपी देखकर दिल को बहुत तसल्ली और आत्मसंतुष्टि मिली।

रमेश शर्मा

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