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आलेख: मंचों की भीड़ में खोता साहित्य लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

 

साहित्यकार बड़ा हो या छोटा, प्रसिद्ध हो या नवोदित, वरिष्ठ हो या उदीयमान; सभी को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर और एक मंच की आवश्यकता होती है। जब सोशल मीडिया नहीं था तब सभी कवियों और लेखकों को मंच मिलना कठिन था और मंचीय कवियों और लेखकों की आभा ही न्यारी हुआ करती थी। अनेक साहित्यकार ऐसे गुज़रे हैं जिन्हें मंच नसीब नहीं हुआ जबकि उनका लेखन उच्च कोटि का था। सोशल मीडिया के दौर में आज उस हर एक साहित्यकार को अनेक ऑनलाइन मंच उपलब्ध हैं जो इस ओर प्रयासरत है। परन्तु सोशल मीडिया पर साहित्यिक मंचों की भरमार ने एक ऐसा तूफ़ान सा खड़ा कर दिया है जिसके थपेड़ों में असल साहित्य कहीं खो सा गया है।

एक साहित्यकार अनेक मंचों से जुड़ा होता है। प्रत्येक मंच प्रतिदिन किसी न किसी विषय पर काव्य अथवा गद्य लेखन प्रतियोगिता आयोजित करता है। यदि उस साहित्यकार को सफल डिजीटल क्रिएटर बने रहना है तो उसे हर मंच के लिए लिखना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, विशेष अवसरों और पर्वों पर हर मंच कविता या लेख आमंत्रित करता है। प्रत्येक वर्ष इन पर्वों की पुनरावृत्ति भी होती है। अब हर साल होली, दीवाली, दशहरा, इत्यादि पर्वों पर एक साहित्यकार कितना और क्या ऐसा लिख पाएगा जो उसने गत वर्षों में नहीं लिखा। लेकिन हम सब लिखते हैं। इसलिए कविताओं और लेखों में आपको हर बार एक ही सार मिलेगा बस शब्द और वाक्य विन्यास अलग होंगे। साहित्य की विविधता और गुणवत्ता दोनों इस चलन से प्रभावित हो रही हैं। मैने स्वयं लिखना बहुत कम कर दिया। जब मन से शब्द निकलते हैं तभी लेखन सार्थक होता है। यहाॅं मैं यह बताना चाहता हूॅं कि उत्कृष्ट और कालजयी रचनाऍं प्रयास कर के भी रोज़-रोज़ नहीं लिखी जा सकती हैं। ऐसी रचनाओं का अनायास ही प्रस्फुटन होता है।

मंचों की इस भीड़-भाड़ और प्रतिदिन लिखने की बाध्यता या विवशता के कारण साहित्य कहीं खोता जा रहा है। बस हम सब मशीन की तरह लिखते जा रहे हैं और मशीन के पास हृदय नहीं होता, संवेदनाऍं और भावनाऍं नहीं होतीं। कुछ साहित्यकार अपवाद स्वरूप प्रतिदिन बहुत अच्छा लिखते हैं लेकिन अधिकांश, मुझ सहित, अपने लेखन में गुणवत्ता पैदा नहीं कर पा रहे हैं।

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