Uncategorized

फिर वही शाम हैं –योगश नवानी– ऋषिकेश उत्तराखंड। सितंबर माह का एक संस्मरण।

 

ऋषिकेश के पावन त्रीवेणी घाट पर मां भगवती भागीरथी की कल-कल करती धारा पैरों को छूकर गुजर रही है। और ढलते सूर्य देव की स्वर्णिम आभा जब मां गंगा को स्पर्श करती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो पानी पर स्वर्ण पिघल रहा हो।
सांध्यकालीन आरती की घंटियों का मधुर नाद और हवा का यह शीतल झोंका न जाने क्यों आज मन को समय के एक ऐसे मोड़ पर ले गया है, जहाँ से दस साल पहले ज़िंदगी ने एक बेहद खूबसूरत करवट ली थी।
साल 2016 का वह दौर, जब सोशल मीडिया के एक आम से ग्रुप में हमारी प्रथम बार पहचान हुई थी। कौन जानता था कि डिजिटल स्क्रीन के उस पार बैठी एक अजनबी महिला मित्र, कालचक्र के प्रवाह में मेरी यादों का सबसे कीमती हिस्सा बन जाएगी।
आज जब मैं यहाँ गंगा तट पर अकेला बैठा हूँ, तो फोन की स्क्रीन पर तैरते उन पुराने संदेंशो की अनुगूँज मन-मस्तिष्क में हिलोरें ले रही है, और मेरा रोम-रोम एक अज्ञात रोमांच से सिहर उठा है।
मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, जब परिचय के बाद प्रथम बार हमारी सुदीर्घ बातचीत हुई थी। वह महज़ शब्दों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि ऐसा लगा था जैसे दो अनजाने किनारे एक-दूसरे से मिल रहे हों।
बातों का सिलसिला ऐसा चला कि वह शाम पूरी तरह सुहानी एवं सरगमी हो गई थी।
उस प्रथम संवाद की हर बात में एक अजीब सा ठहराव था, एक ऐसी निश्छल सहजता थी जिसने मर्यादाओं के भीतर रहते हुए भी दिल को छू लिया था।
आज वक्त बदल चुका है। हम दोनों ही अपने-अपने सांसारिक कर्तव्यों, व्यस्तताओं और जीवन की उलझनों में व्यस्त हैं। नियति का कौतुक देखिए कि हमारी वह पहचान आज भी उसी सोशल मीडिया के दायरे में, अत्यंत गरिमा, शुचिता और परस्पर सम्मान के साथ बरकरार है।
हम रोज़ बात नहीं करते, शायद महीनों कोई संवाद नहीं होता, लेकिन जो एहसास उस पहली सुहानी शाम ने जगाया था, उसकी लौ आज भी उतनी ही ताज़ा और निष्कंप है।
मां गंगा के इस पावन तट की इस आध्यात्मिक गोधूलि बेला में, दूर पहाड़ों के पीछे विलीन होते सूर्यदेव को देखते हुए ऐसा आभास हो रहा है मानो समय का चक्र पीछे घूम गया हो। वर्तमान के इस कोलाहलपूर्ण जीवन में, वह विस्मृत सुहानी शाम आज फिर से मेरे मानस-पटल पर अवतरित हो गई है।
आज इस पावन तट से, इन पावन शब्दों का अर्घ्य, उस पावन अहसास को समर्पित है, जो भौतिक दूरियों के बाद भी अंतरात्मा के अत्यंत सन्निकट है।
मां गंगा की इन पावन लहरों को निहारते हुए आज मन में यह तीव्र अभिलाषा है कि, जब ये शब्द तुम्हारे नेत्रों से होकर तुम्हारे हृदय तक पहुँचें, तो समय की धूलि के पीछे छिपी वह शाम तुम्हारे भीतर भी जी उठे। और व्यस्तताओं के अनंत सिलसिले से क्षण भर को मुक्त होकर, तुम भी ठहर जाओ।
मुझे विश्वास है कि मेरे इन शब्दों को पढ़ते हुए, तुम्हारे होंठों पर भी एक मंद मुस्कान तैरेगी, और ऋषिकेश की इस शीतल बयार की तरह, हमारी उस प्रथम वार्तालाप की सुहानी स्मृतियाँ तुम्हारे अन्तर्मन को भी उसी रोमांच और आत्मीयता से सराबोर कर देंगी… जैसे आज मुझे कर गई हैं।

–योगश नवानी–
ऋषिकेश उत्तराखंड

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Click to listen highlighted text!
error: Content is protected !!