माँ चंद्रघंटा – शिव और शक्ति के मिलन का स्वरूप — संगीता जड़िया

माँ चंद्रघंटा – शिव और शक्ति के मिलन का स्वरूप — संगीता जड़िया
शिव और शक्ति अलग नहीं हैं, वे एक ही श्वास के दो छोर हैं।
जहां पर …
शिव हैं सहस्रार… शांत, मौन, ध्यानस्थ, जो देखते हैं पर बोलते नहीं।
वही …
शक्ति हैं मूलाधार… चंचल, सृजनशील, जो जन्म तो देती हैं पर रुकती नहीं।
और इन दोनों के बीच जो सेतु … है, वही माँ चंद्रघंटा हैं।
जब शक्ति ब्रह्मचारिणी के रूप में अत्यंत तप करके थक गईं, तो शिव ने अपने मस्तक का चंद्रमा उतार कर उनके माथे पर सजा दिया और कहा, अब तुम केवल तपस्विनी नहीं, तुम चंद्रघंटा हो। मेरे मन की शांति अब तुम्हारे माथे पर सुशोभित है, अब जाओ और बजो।
शक्ति ने उस चंद्रमा को घंटे के नाद में बदल दिया, क्योंकि जब शांति बहुत गहरी हो जाती है, तो वह नाद बन जाती है।
यही शिव-शक्ति का मिलन है।
जब शिव का चंद्रमा शक्ति के माथे पर बजता है, तो मणिपुर चक्र की अग्नि शांत होती है और अनाहत, अर्थात हृदय चक्र का द्वार खुलता है।
राम और सीता भी इसी के प्रतीक थे। राम शिव स्वरूप थे, मर्यादा में बंधे हुए मौन, और सीता शक्ति स्वरूप थीं, जो धरती से निकलीं और अग्नि में समा गईं।
अग्नि परीक्षा क्या थी? शिव का शक्ति से यह कहना था कि तुम अग्नि में नहीं हो, तुम स्वयं अग्नि हो।
माँ चंद्रघंटा हमें यही सिखाती हैं कि जब तक शिव शक्ति के माथे पर चंद्रमा नहीं सजाएंगे और जब तक शक्ति शिव के मौन को घंटे के नाद में नहीं बदलेंगी, तब तक कोई भी साधना पूरी नहीं होगी।
इसलिए इस नवरात्रि अपने भीतर के शिव से कहिए, अपना चंद्रमा मुझे दे दो, और अपनी भीतर की शक्ति से कहिए, अब बजो, अब गूँजो।
क्योंकि जो हृदय बजना जानता है, वही जीवित है।
जय माँ चंद्रघंटा।




