वह धुली तो उजली हुई, वह मिली तो पूर्ण हुई – महागौरी से सिद्धिदात्री तक मन की यात्रा संगीता जड़िया ‘सृजन सारथी’

श्रृंखला – नवदुर्गा के नौ रूपों का मनोविज्ञान,
अंतिम कड़ी…
महागौरी तक हम धुल चुके थे, उजले हो चुके थे।
अब क्या बचा? सिर्फ पाना बचा है। और पाना… माँगने से ज्यादा कठिन है। हम सब माँगना जानते हैं, पर पाकर ठहरना किसे आता है?
पुराणों में कहां है…, सिद्धिदात्री के पास आठ सिद्धि, नौ निधि। वही देवी जिसने शिव को भी सिद्ध किया, तब जाकर शिव अर्धनारीश्वर हुए।
सोचो तो ?…सिद्धि बड़ी नहीं बनाती, पूरी बनाती है। अधूरे को पूरा करती है।
*नौ दिन में क्या सीखा, ये कोई पाठ नहीं था… ये तो जीना मात्र था।*…
पहले दिन शैलपुत्री ने उंगली पकड़ कर जन्म लेना सिखाया, जैसे माँ कहती है चल बेटा, इस दुनिया में आ।
फिर ब्रह्मचारिणी आई, उसने इंतजार करना सिखाया, तप क्या होता है, बिना कुछ कहे खड़े रहना।
चंद्रघंटा ने आवाज दी, बोली अब बहुत सह लिया, अब लड़ना होगा, अपने लिए घंटा बजाना होगा।
और जब हम लड़ कर थक गए तो कूष्मांडा हँसी, बोली थक क्यों गई, सृजन कर, हँस कर फिर से बना।
हँसते-हँसते ही स्कंदमाता मिली, उसने गोद में बिठा लिया, कहा प्रेम के बिना सृजन सूखा है।
प्रेम में ही तो विद्रोह जन्मा, कात्यायनी बन कर। जब तुम प्रेम करोगी तो गलत के खिलाफ बोलना भी सीखोगी।
बोलते-बोलते आग लगी, कालरात्रि आई, सब कुछ जला दिया। अहंकार, डर, पुरानी पहचान, सब राख।
राख से ही तो महागौरी निकली, उसने कहा अब धुल जा, बहा दे सब, गंगा भीतर ही बहती है।
और जब धुल कर उजली हुई, तब आज सिद्धिदात्री द्वार पर खड़ी है, कह रही है अब और दौड़ना नहीं, ठहर जाना है। तुम हो गई हो, पूरी हो गई हो।
मां सिद्धिदात्री किसी एक चक्र में नहीं बसती। वो तो सहस्रार के भी ऊपर वाला वो शून्य है जहाँ सब शांत हो जाता है।
वहाँ डर निर्भय हो जाता है, वासना सृजन बन जाती है, अहंकार नेतृत्व, मोह करुणा और शून्यता… पूर्णता।
तभी तो माँ का सिद्ध मंत्र है …
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
आज महानवमी है। आज कुछ मत माँगो। बस अपने आप से कहो … मैं जैसी हूँ, जहाँ हूँ, सिद्ध हूँ। पूरी हूँ।
कन्या पूजन बाहर मत ढूंढो। भीतर जो छोटी सी बच्ची नौ दिन लड़ी, जली, धुली… आज उसी को पूज लो।
नौ दुर्गा बाहर नहीं थीं, भीतर थीं। और आज वो यात्रा पूरी हुई।
जय माँ सिद्धिदात्री।




