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आख़िरी पन्ना — कविता साव

 

रीना पाँचवीं कक्षा में पढ़ती थी। पढ़ने-लिखने में बहुत अच्छी नहीं थी, पर कोशिश हमेशा करती थी। परीक्षा नज़दीक थी और रीना हर दिन देर रात तक पढ़ाई करती, फिर भी उसे लगता— “मैं दूसरों जितनी तेज़ नहीं हूँ…”

एक दिन उसकी क्लास टीचर, मिसेज अरोड़ा, ने बच्चों को एक नई कॉपी दी और कहा—
“इस कॉपी में हर दिन कुछ नया लिखना है, पर एक शर्त है—आख़िरी पन्ना बिल्कुल खाली रखना।”

बच्चे तो खेल-खेल में भरने लगे, पर रीना रोज़ थोड़ी मेहनत से एक पन्ना लिखती—कभी कविता, कभी कहानी, कभी सवाल।

इसी तरह पूरा साल बीत गया। रिज़ल्ट वाला दिन आया। रीना काँपते हाथों से मार्कशीट लेने गई…
और उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं—
वह क्लास में दूसरे नंबर पर थी!

वह दौड़कर टीचर के पास गई—
“मैम! ये कैसे हुआ? मैं तो सबसे धीमी थी!”

मिसेज अरोड़ा मुस्कुराईं और बोलीं—
“साल भर तुमने एक-एक पन्ने में मेहनत भरी। बाकी बच्चे सिर्फ कॉपी भरते रहे। और हाँ… तुम्हारा आख़िरी पन्ना देखा?”

रीना ने कॉपी खोली। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—
“यह पन्ना अभी खाली है… लेकिन इसे भरने की क्षमता तुम्हारे भीतर पूरी है।”

रीना की आँखें भर आईं।
टीचर बोलीं—
“ज़िंदगी भी इसी आख़िरी पन्ने जैसी होती है…
अगर तुमने मेहनत और विश्वास से बाकी पन्ने भरे,
तो आख़िरी पन्ना अपने-आप सुंदर बन जाता है।”

उस दिन के बाद रीना कभी अपने आपको ‘धीमी’ नहीं कहती थी।
वह जान चुकी थी कि धीमे बहने वाली नदी भी समंदर तक पहुँचती है।

कविता साव
पश्चिम बंगाल

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