लाइक युग का साहित्य — कविता साव पश्चिम बंगाल

आज के डिजिटल बाजार में साहित्य भी किसी “ऑनलाइन प्रोडक्ट” की तरह सजा-धजा कर बेचा जा रहा है। फर्क बस इतना है कि यहाँ शब्दों से ज़्यादा पोस्टर की चमक, भाव से ज़्यादा फ़िल्टर, और विचार से ज़्यादा लाइक–कमेंट की कीमत आँकी जाती है। लगता है जैसे साहित्य अब साधना नहीं, सोशल मीडिया मार्केटिंग का कोर्स हो गया है।
कल तक लेखक पाठक की प्रतीक्षा करता था, आज पाठक लेखक की भीड़ में गुम हो गया है। हर हाथ में लेखनी है, हर उँगली कवि है, और हर पोस्ट के नीचे एक अदृश्य सवाल—
“भाई, लाइक क्यों नहीं बढ़ रहे?”
रचना कमज़ोर हो तो कोई बात नहीं, बस साथ में एक खूबसूरत स्त्री की तस्वीर लगा दो—भाव अपने आप “दिल तक पहुँच” जाएगा। शब्दों में धार न हो तो भगवान की फोटो जोड़ दो—आलोचना का डर स्वतः समाप्त। और अगर न स्त्री मिले, न देवता, तो इमोजी हैं न—🙏🔥❤️—भावनाओं की इंस्टेंट नूडल्स!
आज कविता नहीं लिखी जाती, डिज़ाइन की जाती है। पहले छवि, फिर पंक्तियाँ—जैसे शब्द नहीं, कैप्शन हों। सुंदर पोस्टर पर सजा साहित्य ऐसा लगता है मानो विचार नहीं, इवेंट मैनेजमेंट हो रहा हो। रचना पढ़ने से पहले ही आँख तय कर लेती है—यह पोस्ट “अच्छी” है या “स्किप करने लायक”।
पर ज़रा ठहरिए!
जिस साहित्य को कभी समाज का दर्पण कहा गया, क्या वह अब सेल्फ़ी मिरर बन गया है?
जहाँ समाज का यथार्थ नहीं, लेखक की इमेज झलकती है?
सुंदर लड़की की तस्वीर के साथ रचना पोस्ट कर हम समाज को क्या संदेश दे रहे हैं?
कि शब्दों की कोई औकात नहीं जब तक वे दृश्य सौंदर्य की बैसाखी न लें?
कि स्त्री फिर से भाव बेचने का माध्यम है, विचार का नहीं?
और भगवान—वे भी अब भक्ति के नहीं, रीच बढ़ाने के टूल बन गए हैं?
यह व्यंग्य किसी एक लेखक पर नहीं, उस मानसिकता पर है जहाँ साहित्य को पढ़ा नहीं जाता, स्क्रॉल किया जाता है। जहाँ रचना का मूल्य उसके कथ्य से नहीं, उसके “व्यूज़” से तय होता है।
साहित्य आज भी समाज का दर्पण हो सकता है—
बस शर्त इतनी है कि दर्पण पर फिल्टर न लगा हो।
शब्द अपने बल पर खड़े हों,
और लेखक लाइक के नहीं,
सत्य के पीछे दौड़ता हो।
क्योंकि याद रखिए—
पोस्टर सुंदर होने से विचार महान नहीं हो जाता,
और
लाइक बढ़ने से साहित्य अमर नहीं हो जाता।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




