लघुकथा : आख़िरी पन्ना कथाकार : राजेश कुमार ‘राज’

आज रविवार का दिन था। अनिकेत आज अपनी बुक शैल्फ को साफ कर रहा था। अनायास ही उसका हाथ उसके प्रिय उपन्यास ‘सूर्यमुखी’ पर चला गया। अन्यमनस्क ही वह उसके पन्ने पलटने लगा। पन्ने पलटते-पलटते उसने जैसे ही #आख़िरी_पन्ना खोला तो एक पुराना सा पीला पड़ चुका तह किया हुआ काग़ज फर्श पर गिर पड़ा। उत्सुकतावश उसने काग़ज़ उठाया और उसे पढ़ने के लिए खोला। यह क्या? यह तो एक प्रेमपत्र था जो कालेज के दिनों में उसे सुनयना ने दिया था। काग़ज़ खोलते ही अनिकेत पुरानी यादों में खो गया।
सुनयना और वह एक ही क्लास में पढ़ते थे। सुनयना कालेज की सबसे सुंदर लड़की थी। अनिकेत एक सामान्य कद-काठी और रंग-रूप वाला शर्मिला नौजवान था। लेकिन पढ़ने में बहुत होशियार। लड़कियां उस से नोट्स लेने के लिए उतावली रहती थीं। लेकिन वो किसी से ज्यादा बात नहीं करता था। सुनयना ने भी कोशिश की लेकिन अनिकेत ने तवज्जो नहीं दी।
एक दिन रात को उसने अपना स्टडी बैग खोला तो उसमें ‘सूर्यमुखी’ नामक उपन्यास रखा हुआ मिला। उसके बैक कवर और आखरी पन्ने के बीच में उसे सुनयना का प्रेमपत्र मिला। पढ़कर उसकी सांसे धौंकनी की तरह चलने लगीं और माथे पर पसीना बह निकला था। आज तक उसने किसी लड़की का प्रेम प्रस्ताव नहीं पढ़ा था। इसके बाद तो दोनों की प्रेम कहानी पूरे कालेज में प्रसिद्ध हो गयी। कालेज से निकल कर अनिकेत उच्च सरकारी पद पर नौकरी पा गया। नौकरी लगते ही दोनों ने शादी कर ली। अभी सुनयना के हाथों की मेहन्दी भी न सुखी थी कि उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। एक रात सुनयना के पेट में तेज दर्द उठा। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। जहाॅं पर उसकी सघन जांच की गई। डाक्टर ने अनिकेत को अपने चैम्बर में बुलाया और बताया कि सुनयना को चौथी स्टेज का कैंसर है। उसका बचना लगभग नामुमकिन है। अब जो भी इलाज होगा वह उसके बचे हुए जीवन को आरामदायक बनाने के लिए होगा। सुनयना छः महीने तक कैंसर से लड़ी और एक रात उसकी इह लीला समाप्त हो गई।
अनिकेत सुनयना के खत को लेकर बिस्तर पर कटे वृक्ष की तरह गिर पड़ा।
*****




