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पदवी की सीमा और प्रतिभा का विस्तार’ – -डॉ दक्षा जोशी निर्झरा अहमदाबाद, गुजरात।

 

​पदवी अक़्सर विरासत, संयोग या व्यवस्था की देन होती है। एक ऊँचे पद पर बैठा व्यक्ति सम्मान पा सकता है, लेकिन वह सम्मान उस ‘कुर्सी’ का होता है, व्यक्ति का नहीं। जिस दिन पदवी छिन जाती है, वह सम्मान भी ओझल हो जाता है। इसके उलट, प्रतिभा किसी पद या प्रमाणपत्र की मोहताज़ नहीं होती। कबीर के पास कोई डिग्री नहीं थी, पर उनकी प्रतिभा ने युगों को दिशा दी।पदवी हमें दुनिया की नज़रों में ऊँचा उठा सकती है, पर प्रतिभा हमें स्वयं की नजरों में महान बनाती है।
​आज के दौर में हम पदवियों के पीछे इतने अंधे हो गए हैं कि वास्तविक प्रतिभा अक़्सर फाइलों के नीचे दबी सिसकती मिलती है। जब किसी योग्य कलाकार को मंच नहीं मिलता और किसी प्रभावहीन व्यक्ति को ‘पुरस्कार’ की पदवी मिल जाती है, तब समाज का नैतिक पतन शुरू होता है। प्रतिभा वह बीज है जो पत्थर का सीना चीर कर भी उग आता है, लेकिन उसे फलने-फूलने के लिए सम्मान की खाद चाहिए।
​प्रतिभा साधना है, जबकि पदवी केवल उपलब्धि। एक श्रेष्ठ समाज वही है जहाँ पदवी, प्रतिभा के चरणों में अर्पित हो, न कि प्रतिभा को पदवी के सामने घुटने टेकने पड़ें। हमें यह समझना होगा कि पदवी से व्यक्ति ‘बड़ा’ हो सकता है, लेकिन ‘महान’ केवल अपनी प्रतिभा और चरित्र से ही बनता है।

-डॉ दक्षा जोशी निर्झरा
अहमदाबाद, गुजरात।

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