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: इतने निष्ठुर न बनें – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

 

‘निष्ठुरता’ का अर्थ है हृदय की कठोरता, जिसमें दया, करुणा और संवेदना का अभाव होता है। आज की भागदौड़ भरी और आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य भौतिक साधनों को पाने की अंधी दौड़ में इतना व्यस्त हो चुका है कि उसके भीतर से मानवीय मूल्य धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। दूसरों के दुख-दर्द को देखकर भी अनदेखा कर देना आज के समाज की एक गंभीर विडंबना बन गया है।
प्रकृति ने मनुष्य को केवल सोचने-समझने की क्षमता ही नहीं दी, बल्कि दूसरों की पीड़ा को महसूस करने के लिए संवेदनशील हृदय भी दिया है। यदि हम अपने आस-पास किसी असहाय, वृद्ध, पशु-पक्षी या ज़रूरतमंद व्यक्ति को कष्ट में देखकर भी चुप रहते हैं, तो हम अपनी उसी निष्ठुरता का परिचय दे रहे होते हैं।
हमारी निष्ठुरता और संवेदनहीनता न केवल दूसरों के दुखों को बढ़ाती है, बल्कि हमारे अपने जीवन से भी शांति और आत्मिक संतोष को छीन लेती है। प्रेम, सहानुभूति और करुणा ही वे डोरियाँ हैं जो समाज को आपस में जोड़कर रखती हैं। यदि यह डोर टूट गई, तो समाज में केवल स्वार्थ और अकेलापन ही शेष रह जाएगा।
इसलिए, हमें अपने भीतर की संवेदनशीलता को जीवित रखना होगा। दूसरों के आंसुओं को पोंछना और किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्चे अर्थों में मानव जीवन की सार्थकता है। आइए, हम सब यह संकल्प लें कि हम इतने निष्ठुर न बनें कि किसी का दुख देखकर भी हमारा दिल न पिघले, बल्कि हम सदैव करुणा और मानवता के मार्ग पर चलें।

सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर

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