Welcome to Nazar India 24   Click to listen highlighted text! Welcome to Nazar India 24
Uncategorized

वो बुजुर्गों के किस्से – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

 

​बचपन की सुनहरी यादों की ढलती साँझ में आज भी एक दृश्य दिल के सबसे करीब झिलमिलाता है। गाँव का वो बड़ा सा आँगन, बरगद के विशाल पेड़ की शीतल छाया और उसके नीचे बिछी पुरानी खाट,जहाँ हर शाम गाँव के बुजुर्ग जमा हुआ करते थे। आज जब भागदौड़ भरी जिंदगी में पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि वो सिर्फ कहानियों का मजमा नहीं था, बल्कि संस्कारों और जिंदगी की सीख का एक अनमोल खजाना था।
​बाबा जब अपनी पुरानी पीतल की ऐनक ढीली करते और हाथ में चाय का कुल्हड़ थामते, तो हम सभी बच्चे उनके इर्द-गिर्द यूँ बैठ जाते जैसे कोई जादुई पिटारा खुलने वाला हो। दादी अपने आँचल से हाथ पोंछते हुए मुस्कुरातीं और बाबा की बातों में अपने किस्सों का तड़का लगा देतीं।
​बाबा के किस्सों में सिर्फ भूत-प्रेत या राजा-रानी की कहानियाँ नहीं होती थीं, बल्कि उनमें उनकी जिंदगी का कड़वा-मीठा अनुभव छुपा होता था। वे जब अपनी जवानी के दिनों, स्वतंत्रता के दौर, देश के बँटवारे के समय के संघर्षों या गाँव में आए भारी अकाल की बातें सुनाते, तो ऐसा लगता मानो इतिहास हमारी आँखों के सामने जीवंत हो उठा हो। वे बताते थे कि कैसे उस समय अभावों के बावजूद अपनों के बीच अटूट प्रेम और भाईचारा हुआ करता था।
​दादी अक्सर अपने जमाने के त्यौहारों, रीती-रिवाजों और चूल्हे की रोटी के स्वाद के किस्से सुनाया करती थीं। वे जब बोलती थीं, तो उनकी आवाज़ में एक अजीब सी मिठास और आत्मीयता होती थी। उन बातों में कोई दिखावा नहीं था, बस सरल जीवन और निश्छल मन की कहानियाँ थीं। उन किस्सों को सुनते-सुनते हम कब जीवन की सबसे बड़ी सीख सीख जाते थे, इसका अंदाज़ा भी नहीं होता था। बुजुर्गों की वो बातें हमें ईमानदारी, धैर्य, दूसरों की मदद करना और कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत न हारने का पाठ पढ़ा जाती थीं।
​समय का पहिया घूमता गया। आज न वो बरगद की वैसी छाया रही, न शाम को सजने वाली वो चौपाल। आज के इस डिजिटल दौर में जहाँ हर कोई अपने मोबाइल की स्क्रीन में खोया है, बुजुर्गों के वे किस्से कहीं पीछे छूट गए हैं। लेकिन जब भी कोई शांत शाम ढलती है, तो दिल के किसी कोने में बाबा की वो गूंजती हुई आवाज़ और दादी का वो वात्सल्य भरा स्पर्श ताज़ा हो जाता है।
​सचमुच, बुजुर्गों के वे किस्से केवल अतीत की बातें नहीं थीं, बल्कि हमारी संस्कृति, हमारी जड़ों और हमारे अस्तित्व की पहचान थे। वे किस्से आज भी हमारी यादों की धरोहर बनकर हमारे दिलों में ज़िंदा हैं।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!