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कहानी –रक्षाबंधन- मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

 

खून के रिश्ते कभी पुराने नहीं होते

ट्रेन अपनी रफ्तार से मंज़िल की ओर बढ़ी जा रही थी, लेकिन मनु का मन वर्षों पीछे छूटे बचपन की गलियों में भटक रहा था। खिड़की से आती हवा उसके चेहरे को छू रही थी, पर उसकी आँखों के सामने एक-एक कर वे सारे दृश्य जीवंत हो उठे थे। जिन्हें समय अभी तक धुँधला नहीं कर पाया था। पवन के झोकों के बीच मनु अतीत में खो चुकी थी……

“गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होते ही घर का वातावरण बदल जाता था। जैसे ही खबर मिलती कि बुआ अपने बच्चों के साथ आने वाली हैं, मनु की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। ऐसा लगता मानो सूने आँगन में सावन उतर आया हो। घर बच्चों की किलकारियों, हँसी-ठिठोली और शरारतों से गूँज उठता। कभी लंगड़ी-टांग, कभी लुका-छिपी, कभी रूठना तो कभी अगले ही पल हँसकर गले लग जाना…घर भी बड़े होते थे और उनसे भी बड़े थे हम सबके मन…। बच्चों में आपसी स्नेह भरपूर था। सबसे अच्छा जो
उन दिनों में न कोई शिकायत थी, न कोई स्वार्थ, बस प्रेम और अपनापन ही था।

मनु घर में सबसे बड़ी थी। छोटे-छोटे बहन-भाइयों को उसने अपनी गोद में खिलाया था। किसी को खाना खिलाना, किसी को नहलाना, किसी को गोद में लेकर सुलाना—उसे कभी बोझ नहीं लगा। वे नन्हे-नन्हे हाथ हर समय उसकी उँगली थामे उसके पीछे-पीछे घूमते रहते। जब भी वह कहीं जाती, वे मासूम कदम उसके पीछे दौड़ पड़ते। तब कौन जानता था कि एक दिन वही छोटे कदम जिम्मेदारियों की राह पर निकल पड़ेंगे और जीवन सबको अलग-अलग दिशाओं में ले जाएगा।

समय अपनी गति से चलता रहा। पढ़ाई, नौकरी, विवाह और परिवार… सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो गए। मिलना-जुलना शादी-ब्याह तक सीमित रह गया। दिन महीने और साल गुजरते चले गए लेकिन बना रहा तो बस आपसी प्रेम। व्यस्तताओं की विवशताओं में
अनगिनत सावन गुजर गए जिनमें भाईयों की कलाइयाँ सूनी ही रहीं।” तभी ‘चाय- चाय’ की गूँज से मनु की तन्द्रा टूटी….

इसीलिए वर्षों बाद इस बार मनु ने निश्चय किया कि वह स्वयं जाकर भाइयों की कलाई पर राखी बाँधेगी। ट्रेन की हर सीटी उसे मंज़िल के थोड़ा और निकट ले आती, और हर गुजरते लम्हे के साथ उसका हृदय भावनाओं से भरता जाता। बचपन की यादें आखों की कोरों पर समेटे मंजिल और नजदीक आती जा रही थी।

उधर भाई भी किसी छोटे बच्चे की तरह बेचैन थे। क्योंकि बार-बार फोन पर यही सुन रही थी …

“अरे….दीदी, कहाँ पहुँचीं?” कितनी देर और लगेगी..?????

“खाना तैयार है… बताइए कुछ और पसंद हो तो जल्दी से बता दो…

इधर ट्रेन की लेटलतीफी भाईयों की बेचैनी और बढ़ा रही थी।

अरे….दीदी, “अब कितना इंतजार और करें…… आप जल्दी आइए……

मनु हर बार मुस्कुराकर जवाब देती, लेकिन उसकी आँखें नम हो जातींं। उसे महसूस हो रहा था कि उम्र चाहे जितनी बढ़ जाए, भाई-बहन के रिश्ते का बचपन कभी बड़ा नहीं होता।

काफी देर बाद ट्रेन रुकी। मनु ने स्टेशन पर कदम रखा तो लगा जैसे वर्षों की दूरी एक पल में सिमट गई हो। घर के दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते उसकी धड़कनें तेज हो गईं।

दरवाज़ा खुला।

सामने वही भाई खड़े थे, जो कभी उसकी गोद में बैठकर कहानी सुनते-सुनते सो जाते थे। अब उनके कंधे चौड़े हो गए थे, चेहरे पर जिम्मेदारियों की रेखाएँ थी, लेकिन आँखों में वही बचपन चमक रहा था।

भाई ने झुककर दीदी के चरण स्पर्श किए और अगले ही क्षण उसे बाँहों में भर लिया। दोनों कुछ बोल नहीं पाए। शब्दों की जगह आँसू बोल रहे थे। वर्षों की दूरियाँ उस एक आलिंगन में पिघल गईं।सालों पुराने खट्टे मीठे अनुभवों के बीच सबने साथ बैठकर चाय नाश्ता किया।

इधर राखी का थाल सजा रखा था। थाली में रोली अक्षत और मिष्ठान के बीच सजी राखी रंगोली की शोभा को और बढ़ा रही थी। थाली में दीपक जल रहा था, लेकिन उससे कहीं अधिक उजाला भाईयों के चेहरों पर था। भाइयों ने जब स्नेह से दीदी का हाथ थामा, तब मनु के मन में बस एक ही बात उठी… भगवान मेरे भाईयो को हमेशा खुश रखना। इनका जीवन आनंद से भरा रहे।

समय बदल सकता है, उम्र बदल सकती है, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं। लेकिन जिन रिश्तों की नींव प्रेम, त्याग और अपनत्व पर रखी जाती है, वे रिश्ते कभी नहीं बदलते।

उस दिन मनु को लगा, रक्षाबंधन केवल राखी का त्योहार नहीं है। यह उन स्मृतियों का उत्सव है जो कभी बूढ़ी नहीं होती, राखी उन रिश्तों का पर्व है जिनमें दूरी आ सकती है, पर दरार नहीं।

“राखी का धागा तो भाइयों की कलाई पर बँधा था,लेकिन मनु महसूस कर रही थी कि असली बंधन धागों का नहीं, प्रेम का था। समय दूरियाँ बना सकता है, पर खून के रिश्ते कभी अलग नहीं कर सकता।”

भाभी भाईयों का स्नेह और सम्मान से खातिरदारी देखकर मनु का मन गदगद हो चुका था। अब बारी फिर से विदाई की थी। सब भावुक थे
लेकिन सालों बाद फिर से इन पलों को जीने की खुशी भी किसी खजाने से कम नहीं थी।

सच ही कहते हैं लोग…

खून के रिश्ते समय की धूल से कभी धुँधले नहीं पड़ते। प्रेम यदि सच्चा हो, तो बरसों बाद भी गले लगते ही बचपन लौट आता है।

कच्चे धागों के अटूट बन्धन का यह उत्सव रक्षाबन्धन एक पर्व ही नहीं, बचपन को फिर से जी लेने का अवसर है।”

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

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