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नवरात्रि,नृत्य आराधना गरबा — सुनीता तिवारी

 

भारत की सांस्कृतिक धरोहर में नवरात्रि का पर्व विशेष महत्व रखता है।
शक्ति की उपासना और भक्ति का यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि कला, संगीत और नृत्य की समृद्ध परंपराओं को भी जीवंत रखता है।
नवरात्रि की रातें भक्ति-भाव में डूबकर किए जाने वाले गरबा और डांडिया नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं।

गरबा मूलतः गुजरात का पारंपरिक नृत्य है। इसका नाम ‘गरभदीप’ से बना है, जिसका अर्थ है ‘मिट्टी के पात्र में जलता दीपक’।
यह दीपक सृष्टि में ऊर्जा और जीवन का प्रतीक माना जाता है।
स्त्रियां और पुरुष गोल घेरा बनाकर ताल और लय के साथ मां अम्बा की आराधना में गरबा नृत्य करते हैं।
रंग-बिरंगे परिधान, झंकारते घुंघरू और उत्साह से भरे कदम इस नृत्य को भव्यता प्रदान करते हैं।

गरबा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना भी है।
जब लोग ताल के साथ गोल-गोल घूमते हैं तो यह ब्रह्मांड की अनंत गति और शक्ति का प्रतीक बन जाता है।
हर चक्र यह संदेश देता है कि सृष्टि की समस्त ऊर्जा एक ही शक्ति से प्रवाहित होती है…
वह शक्ति है मां दुर्गा।

आज गरबा की परंपरा केवल गुजरात तक सीमित नहीं रही बल्कि पूरे भारत और विदेशों तक फैल चुकी है।
यह नृत्य आराधना सभी को एक सूत्र में जोड़ता है।
चाहे युवा हों या वृद्ध, स्त्रियां हों या पुरुष, सब मिलकर मां के चरणों में अपनी भक्ति अर्पित करते हैं।

नवरात्रि के इन पावन दिनों में गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि श्रद्धा, ऊर्जा और एकता का अद्भुत संगम है।
यह हमें सिखाता है कि भक्ति के साथ जीवन में उल्लास और उमंग भी जरूरी है।

सुनीता तिवारी

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