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माँ की मार — नरेश चन्द्र उनियाल,

संस्मरण

शायद तब कक्षा दो या तीन में रहा हूंगा.. उस दिन स्कूल की छुट्टी थी, शायद रविवार हो..
सुबह लगभग 10 बजे का समय.. नहा धोकर गॉंव की सैर हो रही थी..
मेरा गॉंव बहुत सिस्टमेटिक तरीके से बसा है, 8-10 मकानों की सीधी एक लाइन… फिर उससे आगे की ओर 8-10 मकानों की दूसरी लाइन…
मैने पिछली लाइन पकड़ी… मेरा घर अगली लाइन में है।  चलते-चलते अचनक मेरी नजर एक घर के दीवार पर बने आला (गांवों में कोई चीज रखने के लिए, दीवार पर बनाया गया स्थान) पर पड़ी, उस आले में स्वेटर बुनने की दो सलाइयाँ (बिना धागों की) रखी हुई थी। घर पर कोई नहीं था.. पता नहीं मुझे क्या सूझा कि मैंने वे सलाइयाँ उठाई, और स्वेटर बुनने का उपक्रम करते हुए घर की ओर चल दिया.. मन में कोई चोरी का इरादा भी नहीं था, नहीं तो छुपाकर ले जाता…घर पर माँ (आंगन में एक किनारे पर वर्तन मांजने के लिए बनाया गया स्थाई स्थान में ) वर्तन मांज रहीं थीं.. मेरे हाथ पर सलाई देखकर बोलीं..
” ये सलाइयाँ किसकी हैं नरेश?  कहाँ से लाया है? ”
“माँ…शर्मिला दी के घर से… उनके आले में रखी थी।”
“किसी से पूछकर लाया?”
“नहीं… घर पर कोई नहीं था।” मैंने जबाब दिया।
बस… फिर क्या था… माँ बिना हाथ धोये ही खड़ी हुईं, आँगन में ही जलाने की लकड़ियां पड़ी थीं… एक लकड़ी उठाई और टूट पड़ीं मुझपर… जब पीटते पीटते थक गईं तो कहा -“अभी उलटे पैर जा… और जहाँ पर से उठाये हैं वहीं रखकर आ। ”
मैं ऐसे लापता हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग। तब से आज तक किसी की चीज को हाथ नहीं लगाया है।
माँ आप जहाँ भी हैं, अपने नरेश के हृदय में अंकित हैं। चरण स्पर्श करता हूँ।

– नरेश चन्द्र उनियाल,
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड।

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