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नारी का सौंदर्य– विनेश सिंह

 

तबसे अबतक शब्दों की संरचना का अध्याय रही है।
भाव सृजित कविताओं की नारी सदैव पर्याय रही है।
नारी अगर नहीं होती तो कविताएं कैसे बन पातीं।
श्रृंगारों में ‘रस’ ना होता कैसे इतने गहरे जातीं।
होंठ कहां पंखुड़ियां होते गड्ढे कहाँ गाल में होते।
हिरनी नागिन मोरपंख मतवाले कहाँ चाल में होते।
कविताओं में लचक उसी की परछाईं से आइ रही है।
भाव सृजित कविताओं की नारी सदैव पर्याय रही है।

शब्द वही हैं जिनको रचकर कैसे अलंकार में कहते।
चाँद कहाँ आंगन में आता झरने कहाँ आंख में बहते।
पढ़ते तो ना होतीं रुचिकर और ना होतीं इतनी अच्छी।
उसके बिना सभी छंदों की रह जातीं दीवारें कच्ची।
उसकी भाव भंगिमा से गज़लों पर रंगत आइ रही है।
भाव सृजित कविताओं की नारी सदैव पर्याय रही है।

उसके बिना कथानक रुकते लंबी नहीं कथाएं होतीं।
गर वो सृजित नहीं करती तो इतनी नहीं प्रथाएं होतीं।
ना दर्दों की परत उधिडती ना अश्क़ों की क़ीमत होती।
अपनेपन की धरती पर गर वो रिश्तों के बीज न बोती।
चाल जाल ख़ुश रंज वफ़ा के कितने रंग दिखाइ रही है।
भाव सृजित कविताओं की नारी सदैव पर्याय रही है।

दमन बंदिशें अबला बनकर और कहीं लाचार रही है।
दया खुशी ममता अपनापन का भी आविष्कार रही है।
नारी के दम से चलता कविताओं का बाज़ार न होता।
सब ढह जाते शब्द महल श्रृंगारों का संसार न होता।
उसकी उपस्थिति हमको जीवन का मूल सिखाय रही है।
भाव सृजित कविताओं की नारी सदैव पर्याय रही है।

विनेश सिंह
एटा उत्तर प्रदेश

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