सुबह जब आँख खुली — माला कककड

सुबह जब आँख खुली तो पहला ख्याल यही आया कि लो ,आज तो नया साल है इसीलिए मैं झटपट उठी ,भगवान को नमन किया, अपने घर के आँगन को साफ किया ,दिए जलाए ,रंगोली की और भगवान जी को भी श्रृंगार किया, उसे भोग लगाया, आरती की और सब कुछ कर दिया, फिर जा के अपनी चाय ले के अपने मन पसंदीदा झूले पे बैठ गई।
पर ये क्या ?आज मन कुछ उदास सा था? हाँ कई दिनों से मैं अपने आप से कुछ बातें कर रही थी, कुछ गुमसुम सी भी थी। ये तो अच्छा है कि दिवाली का त्यौहार आया और थोड़ा बहुत दिवाली की तैयारियों में मैं जुट गई थी। पर फिर भी मुझे काफी परेशानी हो रही थी, क्योंकि काफी दिनों से मेरी तबियत खराब हो रही थी और तबियत के खराब होने की वजह से मेरा मन भी शायद बहुत बेचैन हो रहा था।
चाय पीते-पीते मैं यही सोच रही थी कि भगवान जी आपने मेरे साथ ये अन्याय क्यों किया? इतने सालों के संघर्ष के बाद आज मेरी गृहस्थी बहुत ही अच्छी तरह से चल रही है, मेरे दोनों बच्चे भी बहुत ही सज्जन, भले और नेक इंसान बन चुके हैं, काफी अच्छी तरह से वो कमा भी रहे हैं, समाज में हमारी प्रतिष्ठा भी अच्छी तरह से बनी है, तभी तूने मुझे इस तरह की बीमारी क्यों दे दी? क्यों मेरी आयुष्य की डोर को इतना छोटा कर दिया? क्यों हर वक्त मेरे ऊपर ये डर लगा रहता है? मौत का
मौत तो सबको आनी है, ये तो मुझे भी पता है, पर ऐसे डर-डर के मैं कैसे जिऊँगी? और जीवन में जब इतने सुखदायी अवसर आने लगे हैं, तभी क्या मैं उन सुखों को आसानी से नहीं संभाल पाऊँगी? उन सुखों के अवसरों को मुझे जीना है, हे भगवान जी क्या किया है तूने? मेरे किस कर्मों की मुझे सजा दी? बस इसी तरह के काफी सारे विचार मेरे मन में आ रहे थे और मैं बेचैन हो रही थी, मेरी आँख से आँसू भी टपक रहे थे।
और तभी मैंने देखा कि आकाश में आभा प्रगट रही है, सूर्योदय हो रहा है, धीरे-धीरे सूरज जो अभी सुनहरा सा लग रहा था वो ऊपर चढ़ रहा है, साथ-साथ पंछी भी गुनगुनाने लगे हैं, सारे वातावरण में एक अजीब सा सुकून फैला रहा था और नये साल की ये भोर खुशनुमा लग रही थी और मुझे कुछ संदेश दे रही थी, उसी समय मैंने जो गुजराती में एक सुंदर सी कविता लिखी है, उनके शब्द मुझे याद आने लगे, जो थे “लड़ ले एक युद्ध तू अपने विरुद्ध और बन जा अनिशुद्ध ‘उस पंक्ति को याद करके मेरे मन में काफी अच्छा लगा और ये भोर का वातावरण उसने तो मुझे मानो बदल ही दिया और मेरे विचारों को एक नई दिशा दे दी, मेरे मन की निराशा को झकझोर कर मुझे आशा का किरण दिखा दिया.
बस …मैं हंसी-खुशी उठ गई, सारे नेगेटिव thoughts को बाजू में रखकर नए साल के स्वागत के लिए मैं उठ खड़ी हुई और मुझ में काफी सारा उमंग और उत्साह भर गया।
आप सभीको भी नववर्ष की खूब खूब बधाई |
माला कककड
मोरबी
गुजरात




