मुखोटे: सचश्रया झूठ — सीमा शुक्ला चांद

आज रानी बहुत बैचेन है वो यहां वहां घूम रही है उसकी आंखों में कुछ डबडबाया सा तो है पर क्या कोई नहीं जान पा रहा. आज सभी के लिए खुशीयों का दिन है चारों दिशाओं में रंगों के बादल उमड़ आए हैं. रानी के घर भी त्योहार का शोर है। घर की साफ सफाई के साथ साथ पकवानों की खुशबू वातावरण में फैली हुई है. रानी के मां पिताजी किसी की बाट जोह रहें हैं। अभी अभी द्वार पर एक बड़ी सी गाड़ी आकर रूकी है।
अरे ये तो यकिनन रानी के चाचा चाची जी हैं। रानी की मां हाथ में एक लोटे में जल लेकर स्वागत करने को आंगन में आई तभी उनकी देवरानी उनके पैर छूने को झुकी। यह वही देवरानी हैं जिनके घर पिछले वर्ष इन्हीं दिनों रानी के मां पिताजी को आपातकालीन स्थिति में रहना पड़ा था।
उन दिनों का व्यवहार और आज का व्यवहार एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत थे। रानी समझने का प्रयास कर रही थी की चाची ने उस दिन कोई मुखौटा पहना था या आज कोई मुखौटा पहना है। उस वक्त यही चाची रानी की मां से बात करने से कतराती थी। वो अक्सर अपने जेठ जेठानी को अकेला छोड़कर बाहर घूमने चली जाती थी।
जब तक भोजन का समय ना हो जाए वापस नहीं आती थी। अपनी जेठानी से अपने घर के सारे टहल कराती थी। और आज देखो जेठानी के कुछ बोले बिना ही दौड़ दौड़कर सारा टहल कर रही है। आज उसने रानी के दरक्ते ज़ख्म को कुरेद दिया। एक वर्ष पूर्व जो चाची रानी के अस्तित्व को नकार रही थी वहीं चाची आज उसे दुलार रही थी। रानी भी अपनी डबडबाई आंखों से सबकुछ निहार रही थी और मन ही मन उन मुखौटो के बारे में सोच रही थी जो त्योहारो पर घर की दिवालों दरवाजों पर नए रंग के रूप में पोत दिए जाते हैं। जो इन निर्जीव चीजों के सभी जब छुपाते हैं। क्या चाची ने भी आज वही मुखौटा लगाया है। क्या ये दुलार ये प्यार सब कुछ मुखौटो का एक साया है
सीमा शुक्ला चांद




