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लघुकथा : बदलते रिश्ते  –  कथाकार: राजेश कुमार ‘राज’

 

तुषार एक कामयाब बिजनेसमैन था। उसकी पत्नी संगीता, दो बच्चे, वृद्ध माता-पिता और एक छोटा भाई बस यही उसकी दुनियां थी। ऑफिस के बाद वह अपना सारा समय माता-पिता, पत्नी-बच्चों और भाई के साथ व्यतीत करता था। घर-परिवार में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं थी।

आजकल पता नहीं क्यों संगीता खुश नहीं थी। बात-बात पर झगड़ा करती और तिल का ताड़ बनाकर घर की शांति भंग करती। सास-ससुर और देवर के साथ रहना उसे पसंद नहीं था। झगड़ा इतना बढ़ गया कि तलाक की नौबत आ गई।
“मुझे तुम्हारे मां-बाप के साथ नहीं रहना। इन्होंने मुझे नौकरानी समझ रखा है”, तुषार के ऑफिस से आते ही संगीता ने कहा।

“तुम्हारे लिए मैं अपने माता-पिता को नहीं छोड़ सकता” , तुषार ने अपने गुस्से को जब्त करते हुए जवाब दिया।

“तो फिर मुझे छोड़ दो”, संगीता ने लगभग फुफकारते हुए जवाब दिया।

तुषार बात को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कमरे में जाकर बैठ गया और अपने लैपटॉप पर ऑफिस से सम्बंधित कार्य करने लगा। संगीता बस झल्ला कर रह गई।

तुषार के ऊपर उसकी किसी बात का असर न होते देख संगीता ने मन ही मन अपने मायके जाने का फैसला ले लिया। अगले दिन जैसे ही तुषार ऑफिस के लिए निकला, उसने अपना सूटकेस पैक किया, अपने दोनों बच्चों का हाथ पकड़े और अपने मायके के लिए निकल गई।

तुषार ने कई बार फोन पर और कई बार अपनी ससुराल जाकर संगीता को मनाने की भरपूर कोशिश की लेकिन उसने तो सास-ससुर से अलग रहने की ज़िद पकड़ रखी थी। वह टस से मस न हुई। तुषार ने सोचा कि गुस्सा उतरने के बाद शायद स्वयं आ जायेगी। उसे अपने बच्चों की बहुत याद आ रही थी। काम में भी मन नहीं लग रहा था। कम्पनी के काम पर भी उसके पारिवारिक तनाव का बुरा असर पड़ रहा था।

वही हुआ जिसका तुषार को डर था। संगीता ने एक दिन उसे तलाक के काग़ज भिजवा दिए थे। खैर, रोज़ की किच-किच से बचने और अपने आत्मसम्मान की खातिर तुषार ने भी तलाक के कागजों पर हस्ताक्षर कर ही दिए।

अब उसका कम्पनी के काम में मन नहीं लग रहा था। धीरे-धीरे कम्पनी घाटे में जाने लगी। अंत में उसे कम्पनी बेचनी पड़ी। कम्पनी बेच कर जो पैसा हाथ आया उससे तुषार ने देनदारियां चुका दी। दुर्भाग्यवश, उसे संगीता के पिताजी को ही कम्पनी बेचनी पड़ी क्योंकि उनका ऑफर सबसे बेहतर था। अब नये मालिक ने तुषार को कम्पनी में जाॅब आफर की क्योंकि कुछ समय के लिए उन्हें ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो उनके काम सीख लेने तक कम्पनी को सम्भाल ले। आमदनी का कोई अन्य जरिया बनने तक उसने भी नौकरी स्वीकार ली। मालिक अब नौकर बन चुका था। इससे भी बुरा यह हुआ कि उसकी पूर्व पत्नी संगीता को उसके पिता ने कम्पनी का सीईओ नियुक्त कर दिया। अब तुषार के दुर्दिन शुरू हो गये थे। आये दिन संगीता तुषार को सभी कर्मचारियों के बीच बेइज़्ज़त करती जैसे उससे किसी बात का बदला ले रही हो। उनके इस बदलते रिश्ते ने तुषार के जीवन में उथल-पुथल मचा दी थी। उसने तंग आकर एक दिन कम्पनी से इस्तीफा दिया और इस बदलते रिश्ते के प्रकोप से खुद को बचा लिया।
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