प्रेम की परिकाष्ठा” – डॉ इंदु भार्गव जयपुर

बरसों पहले एक छोटे से गाँव में मीरा नाम की लड़की रहती थी। उसकी आँखों में सपने थे, लेकिन दिल में एक नाम बसता था—अर्जुन।
अर्जुन और मीरा बचपन के साथी थे। साथ खेलते, साथ पढ़ते, और कब यह साथ प्रेम में बदल गया, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। पर जीवन की राहें हमेशा सीधी नहीं होतीं। अर्जुन को शहर जाना पड़ा—अपने सपनों को पूरा करने, अपने परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने।
जाने से पहले उसने मीरा से कहा, “मैं लौटूँगा… बस थोड़ा इंतज़ार करना।”
मीरा मुस्कुरा दी, पर उसकी आँखों में छिपा डर अर्जुन देख नहीं पाया।
दिन बीतते गए, फिर महीने, और फिर साल। गाँव में लोगों ने कहना शुरू कर दिया—“अर्जुन अब नहीं आएगा।” मीरा के लिए कई रिश्ते भी आए, पर उसने हर बार एक ही जवाब दिया—“मेरा मन कहीं और बंधा है।”
एक दिन खबर आई कि अर्जुन शहर में बहुत सफल हो गया है। उसके पास सब कुछ है—नाम, पैसा, सम्मान। लेकिन उसने कभी गाँव लौटने की कोशिश नहीं की।
लोगों ने मीरा को समझाया—“अब भी समय है, अपनी ज़िंदगी आगे बढ़ाओ।”
मीरा बस एक ही बात कहती—
“प्रेम की परिकाष्ठा पाने के लिए साथ होना जरूरी नहीं, सच्चा होना जरूरी है।”
सालों बाद, एक शाम गाँव के रास्ते पर एक थका हुआ आदमी लौटा। उसके कदम भारी थे, आँखों में पछतावा था। वह अर्जुन था।
वह सीधे मीरा के घर पहुँचा। दरवाज़ा खुला, तो सामने वही चेहरा था—थोड़ा बदला हुआ, लेकिन वैसा ही शांत।
अर्जुन ने धीमी आवाज़ में कहा, “मैं लौट आया… बहुत देर हो गई ना?”
मीरा ने उसे देखा, और हल्की मुस्कान के साथ बोली,
“प्रेम में देर नहीं होती, अगर विश्वास ज़िंदा हो।”
उस पल अर्जुन समझ गया—प्रेम सिर्फ मिलने का नाम नहीं, बल्कि इंतज़ार, त्याग और अटूट विश्वास का दूसरा नाम है।
और यही है—प्रेम की परिकाष्ठा।
डॉ इंदु भार्गव जयपुर




