हीर और रांझा — नरसा राम जांगु डीडवाना_कुचामन

जब इश्क़ धड़कता है, तो नदी भी रुक कर देखने लगती है।
जब दिल मिलते हैं, तो झेलम का पानी भी गीत गाने लगता है।
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बहुत साल पहले पंजाब की धरती पर, तख्त हज़ारा गाँव में एक अमीर चौधरी के घर रांझा पैदा हुआ। चार भाई थे, रांझा सबसे छोटा और सबसे लाड़ला। बांसुरी बजाने में ऐसा जादू था कि गाँव की गाय-भैंस भी रुक कर सुनती थीं। पर भाई भाभियों को उसका ये रंग-ढंग पसंद नहीं आया। पिता के जाने के बाद उन्होंने उसे घर से निकाल दिया।
रांझा अपनी बांसुरी लिए चल पड़ा। चलते-चलते झेलम के किनारे झंग सियाल पहुँचा। वहाँ के चौधरी की एक बेटी थी — हीर। नाम ही नहीं, शक्ल-सूरत से भी हीरा। घुंघराले बाल, बड़ी-बड़ी आँखें, और बातों में ऐसी मिठास कि सुनने वाला सब भूल जाए।
रांझा ने नदी किनारे बांसुरी छेड़ी। धुन ऐसी उठी कि हीर अपनी सहेलियों के साथ दौड़ी चली आई। रांझा को देखा, बांसुरी सुनी, और बस… दोनों की आँखें मिलीं और कहानी शुरू हो गई। हीर ने अपने पिता से कह कर रांझे को अपनी भैंसें चराने का काम दिलवा दिया।
दिन बीतते गए। रांझा बांसुरी बजाता, हीर सुनती। दोनों साथ-साथ झेलम के किनारे बैठते, बातें करते, हँसते। गाँव वाले भी कहने लगे — “ये तो ऊपर वाले की जोड़ी है।”
पर इश्क़ की राह आसान कहाँ होती है। हीर के चाचा कैदो को ये रिश्ता चुभने लगा। उसने हीर के माँ-बाप के कान भर दिए। उन्होंने गुस्से में हीर की शादी खेड़ा खानदान के सैदा से कर दी।
हीर डोली में बैठ कर रोती हुई ससुराल गई, पर उसका दिल झेलम के किनारे ही रह गया। रांझा पागल सा हो गया। उसने जोगी का भेस बनाया, कान छिदवाए, राख मली, और निकल पड़ा अपनी हीर को ढूँढने।
बहुत भटकने के बाद वो हीर के गाँव पहुँचा। हीर ने जोगी के भेस में भी अपने रांझे को पहचान लिया। दोनों मिले तो लगा जैसे बिछड़ी हुई नदियाँ फिर मिल गई हों। गाँव की पंचायत बैठी, सबने माना कि सच्चा प्यार हीर-रांझे का ही है। सैदा ने भी हीर को आज़ाद कर दिया।
हीर-रांझा की शादी की तैयारी होने लगी। पर हीर के चाचा कैदो से ये खुशी देखी नहीं गई। उसने धोखे से हीर के खाने में ज़हर मिला दिया। हीर ने वो खाना खा लिया। खबर सुनते ही रांझा दौड़ा-दौड़ा आया, पर तब तक हीर की साँस टूट चुकी थी। रांझा ने हीर को गोद में लिया, एक बार जी भर के देखा, और वहीं उसकी साँस भी रुक गई।
कहते हैं झेलम आज भी उनके मिलने की जगह पर कुछ ज़्यादा ही शोर करती है। और जब भी कोई सच्चे दिल से बांसुरी बजाता है, हवा में हीर की हँसी गूंज जाती है।
कहानी से सीख: सच्चा प्यार जात-पात, अमीरी-गरीबी कुछ नहीं देखता। वो तो बस दिल से दिल का रिश्ता होता है, जो दुनिया लाख चाहे तो भी तोड़ नहीं सकती।
नरसा राम जांगु
डीडवाना_कुचामन




