Uncategorized

मेरी यूरोप यात्रा: एक संस्मरण ‘- डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

 

यूरोप की यात्रा मेरे लिए केवल भौगोलिक दूरियों को नापना नहीं, बल्कि अपनी संवेदनाओं के विस्तार का एक आध्यात्मिक अनुभव रही। जैसे ही मैंने इस महाद्वीप की धरती पर कदम रखा, मुझे लगा मानो इतिहास और वर्तमान के बीच की दीवार ढह गई हो। यहाँ की हवाओं में कला की महक है और वास्तुकला के पाषाणों में सदियों पुरानी गाथाएँ सुरक्षित हैं।
प्रकृति और कला का संगम
स्विस आल्प्स की शुभ्र चोटियों को निहारते हुए मुझे हिमालय की गरिमा स्मरण हो आई; वहाँ की नीरवता में एक अद्भुत संगीत था। वहीं पेरिस और लंदन जैसे शहरों ने सिखाया कि कैसे मनुष्य अपने स्वप्नों को ‘एफिल टावर’ या ‘टेम्स’ के किनारों पर अमर कर सकता है। इटली के रोम और फ्लोरेंस में ‘पुनर्जागरण’ की कला को साक्षात देखना ऐसा था, मानो माइकल एंजेलो की छेनी सीधे हृदय पर प्रभाव कर रही हो।
इस यात्रा का सबसे सुंदर पक्ष वहाँ के लोगों की जीवनशैली रही। अपनी विरासत के प्रति उनका गौरव, समय की पाबंदी और हर खिड़की पर खिले फूलों जैसी उनकी सुरुचिपूर्ण सादगी ने मुझे गहरे तक प्रभावित किया। मैंने अनुभव किया कि भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, किंतु आत्मीयता का व्याकरण वैश्विक है।

यह भ्रमण केवल विदेशी गलियों की सैर नहीं, बल्कि पूरब के अध्यात्म और पश्चिम के भौतिक कौशल के मिलन का साक्षी बनना था। इन स्मृतियों के झरोखे ने मेरे भीतर विचारों का एक नया ‘निर्झर’ प्रवाहित कर दिया है, जो मेरी लेखनी को भविष्य में नए आयाम प्रदान करेगा।
-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!